________________
१५०/गो, सा. ओवकाण्ड
माथा११६
शरीर पर्याप्ति तिल की खली के समान उस खलभाग को हड्डी आदि कठिन अवयवरूप से और तिल के तेल के समान रसभाग को रस, रुधिर, वसा, वीर्य आदि द्रव अवयवरूप से परिणमन करने वाले औदारिक प्रादि शरीररूप परिणमाने की शक्ति की पूर्णता को शरीर पर्याप्ति कहते
इन्द्रियपर्याप्ति- योग्य देश में स्थित रूपादि से युक्त पदार्थों को ग्रहण करने रूप शक्ति की पूर्णता को इन्द्रियपर्याप्ति कहते हैं, किन्तु इन्द्रियपर्याप्ति के पूर्ण हो जाने पर भी उसी समय बाद्य पदार्थों का ज्ञान उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि उस समय उसके उपकरणरूप द्रव्येन्द्रियाँ नहीं पायी जाती हैं।
श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति-उच्छवास और निःश्वासरूप शक्ति की पूर्णता को श्वासोच्छवास पर्याप्ति कहते हैं।
भाषापर्याप्ति-भाषावर्गणा के स्कन्धों के निमित्त से चार प्रकार की भाषारूप से परिणमन कराने की शक्ति को पूर्णता को पोष्टि कहते हैं :
मनःपर्याप्ति-मनोवर्गरणामों से निष्पन्न द्रव्यमन के अवलम्बन से अनुभूत अर्थ के स्मरणरूप शक्ति की उत्पत्ति को मनःपर्याप्ति कहते हैं।
मन सहित जीवों को संज्ञी कहते हैं। मन दो प्रकार का है-द्रव्यमन और भावमन । पुद्गलविपाकी अंगोपांग नामकर्म के जदय की अपेक्षा रखने वाला द्रव्यमान है। तथा वीर्यान्तराय और नो-इन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम की अपेक्षा से आत्मा में जो विशुद्धि उत्पन्न होती है, वह भावमन है।
शखा-जोव के नवीन भव को धारण करने के समय ही भावेन्द्रियों की तरह भावमन का भी सत्त्व पाया जाता है इसलिए जिस प्रकार अपर्याप्तकाल में भावेन्द्रियों का सदभाब कहा जाता है उसी प्रकार वहाँ पर भावमन का सद्भाव क्यों नहीं कहा गया?
समाधान नहीं, क्योंकि बाह्य न्द्रियों के द्वारा अग्राह्य द्रव्यमन का अपर्याप्त अवस्था में अस्तित्व स्वीकार कर लेने पर, जिसका निरूपण विद्यमान है ऐसे द्रव्यमन के असत्व का प्रसंग आ जाएगा।
शङ्का पर्याप्ति के निरूपण से ही द्रव्यमन का अस्तित्व सिद्ध हो जाएगा।
समाधान-नहीं, क्योंकि बाह्य अर्थ की स्मरणशक्ति की पूर्णता में ही पर्याप्ति इस प्रकार का व्यवहार मान लेने से द्रव्यमन के अभाव में भी मनःपर्याप्ति का निरूपण बन जाता है। 'बाह्य पदार्थों की स्मरणरूप शक्ति से पूर्व द्रव्यमन का सद्भाव बन जाएगा' ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्यमान के योग्य द्रव्य की उत्पत्ति के पहले उसका सत्त्व मान लेने में विरोध प्राता है। अतः अपर्याप्तावस्था में भावमन के अस्तित्व को नहीं कहना द्रव्यमान के अस्तित्व का ज्ञापक है, ऐसा समझना चाहिए ।
१ से ५ तक घ.पु. १५,२५५ व . ३ परिशिष्ट पृ. ३०-३१। ६. प.पु. १५, २५६.६०।