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________________ गाथा ११०-१११ जीवममास/१५१ प्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्यग्रवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए । बादरनिगोद को छोड़कर और निगोदप्रतिष्ठित लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों द्वारा बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। यहां भी गुणकार पल्य के असंख्यातवेंभाग प्रमाण है। निगोदप्रतिष्ठित लब्ध्यपर्याप्तक को अवगाहना को छोड़कर बादरवनस्पतिकाधिकप्रत्येकशरीर लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहणकर एक प्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से मारवृद्धियों द्वारा द्वीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सरश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ भी गुणकार पल्य के असंख्यातवें भागप्रमाण है। अब प्रत्येक शरीर लमध्यपर्याप्तक को छोड़कर द्वौन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहणकर चारवृद्धियों द्वारा श्रीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तक को जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए । यहाँ भी गुणकार पल्योपम का प्रसंख्यातवांभाग है। अब द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तक को छोड़कर त्रीन्द्रिय लबध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों द्वारा चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तक को जघन्य अवगाहना के सरश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ भी गुणकार पल्योपम का मसंख्यातवांभाग है। पश्चात् श्री.न्द्रय को छोड़कर चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना करके एकप्रदेश अधिक इत्यादिक क्रमसे नारवद्धियों द्वारा पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए । यहाँ भी गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँभाग है। तत्पश्चात् पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि ऋमसे चारवृद्धियों द्वारा सूक्ष्मनिगोद निवृत्तिपर्याप्त की जघन्य-अवगाहना के सम होने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ गुणकार प्रावली का असंख्यातवाँभाग है। अब सूक्ष्मनिगोदनिवृत्तिपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादिश्रम से आवलो के असंख्यातवें भाग से खण्डित कर उसमें से एक खण्डप्रमाण बढ़ाना चाहिए। इसप्रकार बढ़कर यह अवगाहना सूक्ष्म निगोदनित्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट प्रवगाहना के सरण होती है। पश्चात् इसको ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से इसी अवगाहना को पावली के असंख्यातवैभाग से खण्डित कर उसमें एकखण्डप्रमाण जबतक अधिक न हो जावे तबतक बढ़ाना चाहिए। इसप्रकार बढ़कर यह अवगाहना सूक्ष्मनिगोद पर्याप्तयाको उत्कृष्ट अवगाहना के समान होती है। फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों द्वारा सूक्ष्मवायुकामिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के प्राप्त होने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ गुणकार प्रावली का प्रसंस्थातवा भाग है। यह गुणकार सूक्ष्मजीवों में सर्वत्र कहना चाहिए। पश्चात् इसको ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से इस अवगाहना के ऊपर इसी अवगाहना को प्रावली के असंन्यातवैभाग से खण्डिन कर एकखण्डप्रमाण बढ़ाना चाहिए। इसप्रकार बढ़ाने पर सूक्ष्मवायुकायिक नित्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना होती है। पश्चात् उसके ऊपर एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से उक्त अवगाहना को ही प्रावली के प्रसंख्यातवें भाग से खण्डितकर एक खण्डप्रमाणवृद्धि हो जाने पर सूक्ष्मवायुकायिकपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना प्राप्त होती है । पश्चात् इसको एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों द्वारा सुक्ष्मतेजकायिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए । पश्चात् इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा आवली के असंख्यातवें भाग से खण्डित कर एक खण्डप्रमारण महाना चाहिए जब तक सुक्ष्म तेजकायिक निवृत्त्यपर्याप्त को उत्कृष्ट अवगाहना न प्राप्त हो जाये। पश्चात् इसको एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा बढ़ाना चाहिए जब तक सूक्ष्मतेजकायिक पर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना के समान न हो जाये। फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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