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________________ १५०/मो. सा. जीव काण्ड गाथा ११०-१११ होती है जब तक सूक्ष्म अपर्याप्त वायुकायिक की जघन्य अवगाहना की उत्पत्ति के योग्य प्रावली के असंख्यातवें भागप्रमाण गुणकार हो जाने ॥११०।। इसीप्रकार पाये सर्वत्र प्रत्येक जीवसमास के अन्तराल में यथायोग्य प्रदेशवृद्धि क्रम से अवगाहना-स्थानों को जानना चाहिए ।।१११।। विशेषार्थ-पश्चात् यहाँ से (जघन्य परोतासंख्यातगुणवृद्धि से) आगे एक प्रदेश अधिक, दो प्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातगणवद्धि के चालु रहने पर सुक्ष्मलयपर्याप्तक निगोद जीव की विगाहना में प्रावली के असंख्यातवें भागमात्र गणकार के प्रविष्ट हो जाने पर सूक्ष्मवायुकायिक लयपर्याप्नक को जघन्य अवगाहना के सहश सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जोब को अजवन्य-अनुत्कृष्ट प्रवगाहना होती है ।' अब सूक्ष्मनिगोद जीव की अवगाहना को छोडकर और सक्षम वायकायिक लब्ध्यपप्तिक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों (असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातमुणवृद्धि) द्वारा सूक्ष्मवायुकाथिक लब्ध्यपर्याप्तक की अजघन्य-अनुत्कृष्ट अवगाहना को सूक्ष्मतेजकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के समान हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। तत्पश्चात् बायकायिम ओनोडकर जानकाचिन नामपर प्ता की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके प्रदेश अधिक श्रम से चारवृद्धियों द्वारा सूक्ष्मजलकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सहश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए । पुनः तेजकायिक को छोड़कर और सूक्ष्मजलकायिक लध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चार वृद्धियों द्वारा सूक्ष्मपृथ्वीकायिक लमध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। पुनः जलकायिक को छोड़कर और सूक्ष्मपृथ्वीकायिक लब्ध्यपर्याप्तक को जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चार वृद्धियों द्वारा बादरवायुकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य-अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। विशेष इतना है कि यहाँ गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँभाग है, क्योंकि वह परस्थान गुणकार है। पुन: सूक्ष्म पृथ्वीकायिक को छोड़कर और बादरवायुकायिक लन्थ्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि कम से चारवद्धियों द्वारा बादरतेजकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ भी गुणकार पल्पोपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण है, क्योंकि वादर से बादरजीव को अवगाहना का गुणकार पल्योगम के असंख्यातवें भागप्रमाण है । बादरवायुकायिक को छोड़कर और बादर तेजकाथिक-लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रमसे चारवृद्धियों द्वारा बादर जल कायिक लब्ध्यपर्याप्तक को जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ भी गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँभाग है। पश्चात् बादरतेजकायिक को छोड़कर और बादरजलकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेण अधिक इत्यादि क्रमसे चारवृद्धियों द्वारा बादरपृथ्वीकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। पुनः बादर जलकायिक को छोड़कर और बादरपृथ्वीकायिक लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारद्धियों द्वारा बादरनिगोद लयपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सदृश हो जाने तक बढ़ाना चाहिए। पश्चात् बादरपृश्वीकायिक को छोड़कर और बादरनिगोद लन्थ्यपर्याप्ता की जघन्य अवगाहना को ग्रहण करके प्रदेशअधिक क्रम से चारवृद्धियों द्वारा निगोद १. व. पृ. ११ पृ. ४०.
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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