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________________ जीaante / १४९ अवगाहना की वृद्धि होकर जघन्य अवगाहनाप्रमाण प्रदेशों के बढ़ जाने पर तिगुणीवृद्धि होती है । उस अवगाहना का भागहार जघन्य - अवगाहनासम्बन्धी भागहार के तृतीय भाग प्रमाण (3) होता है । पश्चात् एक प्रदेश अधिक, दो प्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से जघन्य अवगाहना मात्र प्रदेशों की वृद्धि होने पर चतुगुणी वृद्धि होती है । वहाँ भागहार जघन्य अवगाहनासम्बन्धी भागहार (पल्योपम के संख्यात भाग) के चतुर्थभाग प्रमाण होता है। इस प्रकार जघन्य अवगाहनासम्बन्धी गुणकार के उत्कृष्ट संख्यात मात्र तक ले जाना चाहिए ।" गाथा १०८-१११ प्रवरे बरसंखगुणे तच्चरिमो सहि रूव संजुत्ते । उग्गाहरणम्हि पढमा होदि प्रवत्तन्वगुरणषड्ढी ॥। १०८ ।। प्रवरपरित्तासंखेर वरं संगुरिणय रूथपरिहीणे । तच्चरिमो मनुत्रे सिंजगुणपढमं ॥ १०६ ॥ गाथार्थ जघन्य अवगाहना को उत्कृष्ट संख्यात से गुणा करने पर संख्यातगुणवृद्धि का उत्कृष्ट स्थान होता है। उस अवगाहना में एकप्रदेश मिलने पर प्रथम प्रवक्तव्य गुणवृद्धि होती है । जघन्यपरीतासंख्यात से जवन्यमवगाहना को गुणा करके एक कम करने पर अवक्तव्य गुणवृद्धि का अन्त होता है । अवक्तव्यगुणवृद्धि के उस अन्तिम स्थान में एक मिलाने पर प्रसंख्यातगुणवृद्धि का प्रथमस्थान होता है ।। १०८ १०२ ।। विशेषार्थ - जघन्य अवगाहनासम्बन्धी गुणकार के उत्कृष्ट संख्यात हो जाने पर अवगाहना उत्कृष्टसंख्यातगुणो हो जाती है। उस अवगाहना का भागहार, जघन्य अवगाहना सम्बन्धी अर्थात् पत्योपम के असंख्यातवेंभाग प्रमाण भागहार को उत्कृष्टसंख्यात से खंडित करने पर उसमें से एक खण्ड के बराबर होता है। उसके ऊपर एक प्रदेश अधिक दो प्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से एक जघन्य अवगाहनामात्र प्रदेशों की वृद्धि हो जाने पर प्रसंख्यातगुणवृद्धि का प्रारम्भ और संख्यातगुरपवृद्धि का अन्त होता है । इस श्रवगाहना का भागहार जघन्य अवगाहनासम्बन्धी भागहार (पत्योपम का प्रसंख्यातवाँ भाग) को जघन्य परीतासंख्यात से खण्डित करने पर उसमें एकखण्ड के बरावर होता है । गोम्मटसार में उत्कृष्टसंख्यातगुणवृद्धि के पश्चात् और जघन्य असंख्यातगुणवृद्धि के पूर्वस्थानों को वक्तव्यगुणवृद्धिरूप कहा गया है । धवलाकार ने उन स्थानों को संख्यातगुणवृद्धिरूप कहा है। मात्र संज्ञा-भेद है, अन्य कुछ भेद नहीं है । आवलियासंखभाग गुरागारे । बाउसोग्गाहरणं कमलो ॥ ११०॥ बुतरेण तत्तो, तप्पाग्गे जावे, एवं उवरि वि श्रो, पदेसर्वाढक्कमो जहाजोग्गं । सत्यत्येक कहि य, जीवसमासारण विच्चाले ॥ १११ ॥ गाथार्थ --- असंख्यात गुणवृद्धि के उक्त प्रथम स्थान के ऊपर एक-एक प्रदेश की वृद्धि तब तक १. ध. पु. ११ पृ. ३६ ॥ २. प. पु. ११ पृ. ३६-४० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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