SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 181
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १४८/गो. मा. जीवकाण्ड गाथा १०६-१०७ भाग वृद्धि। इसी प्रकार जघन्य असंख्यातवें भाग की वृद्धि समाप्त हो जाने पर और उत्कृष्ट संख्यातवेंभाग को वृद्धि प्रारम्भ होने से पूर्व की वृद्धियाँ न तो असंख्यातवें भाग वृद्धि हैं, और न संख्यातवें भाग वृद्धियाँ हैं, इसलिए गोम्मटसारकार ने उनकी प्रवक्तव्यवृद्धि संज्ञा दी है, किन्तु धवलाकार ने उनको असंख्यातवेंभागवृद्धि कहा है, क्योंकि वे उत्कृष्ट संख्यातवें भागवृद्धि से हीन हैं। इसप्रकार दोनों गायों में मात्र संसाभेद है. भाव में कोई अन्तर नहीं है और न संख्यातवें भाग की वृद्धि प्रादि में कोई अन्तर है। प्रवरद्ध अवरुरि उड्ढ़े तब्वढिपरिसमत्ती हु । रूले तदुवरि उड्ढे होदि अवत्तवपढमपदं ॥१०६।। रूऊरणवरे अवरस्सुरि संवढिवे तदुक्कस्सं । तहि पवेसे उढे पठमा संखेज्जगुरणवढी ॥१७॥ गाथार्थ-जघन्य अवगाहना के प्रमाण के प्राधे की वृद्धि हो जाने पर संख्यात भाग वृद्धि की परिसमाप्ति हो जाती है। उसके ऊपर एक प्रदेश की वृद्धि होने पर अवक्त व्यवृद्धि का प्रथम स्थान होता है । जघन्य अवगाहना के ऊपर एक प्रदेश कम जघन्य अवगाहना प्रमाण वृद्धि होने पर प्रवक्तव्यवृद्धि का उत्कृष्ट स्थान होता है । उसमें एकप्रदेश की वृद्धि हो जाने पर संख्यातगुणवृद्धि का प्रथम स्थान होता है ॥१०६-१०७।। विशेषार्थ-उत्कृष्टसंख्यात का विरलन करके जघन्य अवगाहना को समलण्ड करके देने पर विरलनरूप के प्रति (संख्यातभागवृद्धि के आदिस्थान में) वृद्धिंगत प्रदेशों का प्रमाण प्राप्त होता है। यहाँ से लेकर ऊपर संख्यातभागवद्धि होकर जाती है, जब तक उपरिम विरलन (पल्यापम के असंख्यातवें भाग प्रमाण) अर्धभाग स्थित रहता है । यहाँ संख्यातगुणवृद्धि की प्रादि और संख्यातभागवद्धि की समाप्ति हो जाती है। जघन्य संख्या दो है, क्योंकि संख्या दो में प्रारम्भ होती है और गणना एक से प्रारम्भ होतो है। किसी राशि को एक से भाग या गुणा करने पर हानि या वृद्धि नहीं होती अत: एक को सख्यासंज्ञा नहीं दी है। जघन्य अवगाहना को जघन्यसंख्यात दो से भाजित करने पर जघन्यअवगाहना का अर्धभाग प्राप्त होता है । जवन्य अवगाहना के ऊपर ज. अ. के अर्धभाग प्रमाण प्रदेशवृद्धि हो जाने पर संख्यातवेंभागबृद्धि का अन्तिम स्थान प्राप्त हो जाता है और जघन्य अवगाहना के ऊपर जघन्य अवगाहना प्रमाण प्रदेशों की वृद्धि हो जाने पर संख्यातगुणवद्धि प्रारम्भ होती है, क्योंकि जघन्य अवगाहना का प्रमाण दुगुणा हो जाता है, किन्तु इन दोनों के मध्य के स्थान न तो संख्यातभागवृद्धि रूप हैं और न संख्यातगुण वृद्धिरूप हैं। इन स्थानों को गोम्मटसारकार ने अवक्तव्यस्थान की संज्ञा दी है, किन्तु ये स्थान जघन्यसंख्यातगुणवृद्धि स्थान से हीन है। अतः इन स्थानों को संख्यातभागवृद्धि में गर्भित किया है, क्योंकि संख्यातगणवृद्धि के ग्रादिस्थान से पूर्व के स्थान संख्यात भागवृद्धिरूप होगे ! संन्यातगुणवृद्धि के ग्रादिस्थान से लेकर फिर भी एकप्रदेश अधिक, दो प्रदेश पधिक क्रम से १. घ. पु. ११ पृ. ३६। २. त्रिलोकसार 1
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy