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________________ १५२/गो. सा. जीबकापड गाथा ११०-१११ अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों द्वारा सूक्ष्मजलकायिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के सहश होने तक बढ़ाना चाहिए। पश्चात् इस अवगाहना को देश अधिन इमादिगा : 'आतंकवासभागवृद्धि द्वारा बढ़ाना चाहिए जब तक सूक्ष्मजलकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना के सदृश न हो जावे । फिर इस अवगाहना के ऊपर एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से बढ़ाना चाहिए जबतक सूक्ष्मजलकायिक पर्याप्तक की उत्कृष्ट प्रधगाहना के सदृश न हो जावे । पश्चात् इस अवगाहना को एक प्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारवृद्धियों द्वारा सूक्ष्मपृथ्वीकायिक की जघन्यअवगाहना के सदृश होने तक बढ़ाना चाहिए। पश्चात् इस अवगाहना को एक प्रदेश अधिक इत्यादि प्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा मुक्ष्मपृथ्वीकायिक निवृत्त्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट प्रवगाना तक बढ़ाना चाहिए। पश्चात् इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा सूक्ष्मपृश्वीकायिक पर्याप्त की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। तत्पश्चात् इस अवगाहना को एक प्रदेश अधिक इत्यादि जाम से चारवृद्धियो द्वारा बादरवायुकायिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना के प्राप्त होने तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ गुणकार पल्पोपम का असंख्याताभाग है। पश्चात् इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादिक्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा बादरवायुकायिक नित्यपर्याप्तक को उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए।' तत्पश्चात इरा अबगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातवें भाग वृद्धि के द्वारा बादरवायुकायिक पर्याप्तक की उत्वृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चार वृद्धियों द्वारा बादरतेजकायिक पर्याप्तक को जघन्य अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए । यहाँ गुणकार पत्योपम का असंख्यातवाँभाग है। पश्चात् इस अबगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा बादरतेजकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। पश्चात् इस छ.वगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यात भागवृद्धि द्वारा बादरतेजकायिक पर्याप्त की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए । तत्पश्चात् इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारों वृद्धियों द्वारा वादरजलकायिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए । यहाँ गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है । पश्चात् इस अवगाहना को एक प्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा बादरजलकायिक निवृत्त्य पर्यातक की उत्कृष्ट अवगाहमा तक बढ़ाना चाहिए। फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा वादरजलकायिक पर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। तत्पश्चात् इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से नारों वृद्धियों द्वारा बादर पृथ्वीकायिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ गुणवार पत्योपम का असंख्यातयाँ भाग है। फिर एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम मे असंख्यातभाग वृद्धि के द्वारा बादरपृथ्वीकायिक नित्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा बादरपृथ्वीकायिक पर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। फिर इस अवगाहना की एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से चारों वृद्धियों द्वारा बादरनिगोदपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए। यहाँ गुणकार पत्य का असंख्यातवाँभाग है। फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि ऋम से असंख्यातभागवृद्धि के द्वारा बादरनिगोदनित्यपर्याप्तक को उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए । फिर इस अवगाहना को एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम से असंख्यातभागवृद्धि द्वारा बादर निगोदपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना तक बढ़ाना चाहिए । तत्पश्चात एकप्रदेश अधिक इत्यादि क्रम १. पवल पु. ११ पृ. ४६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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