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________________ तरह बयालीस, छियालीस पचास, चौवन, अठावन, बासठ, छियासठ सत्तर और चौहत्तर शुन्य होते हैं। आगे भी अपने जघन्य से अपने उत्कृष्ट पर्यन्त स्थान गणना के द्वारा शुन्य गणना जाननी चाहिए। ऊपर की पंक्ति के जघन्य से नीचे की पंक्ति का जघन्य दो शून्य छोड़कर होता है। सतरहवीं पंक्ति में एक में ही बारह जीवों के जघन्य से उत्कृष्ट पर्यन्त अपने-अपने योग्य शुन्य लिखकर, उसके नीचे दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों के अपने-अपने जघन्य से अपने-अपने उत्कृष्ट पर्यन्त चार पंक्तियों में अपनी-अपनी स्थान गणना से शून्यों की गणना जानना । इस प्रकार रखने पर सब अवगाहों को रचना मत्स्य के श्राकार होती है । अतः (३) पृष्ठ ७८० गाथा ७२९ में "दोणि श्राहारा" पद से शाहारक काययोग तथा आहारक मिश्र काययोग गृहीत होते है । ( बल २२०२४) तथापि यहाँ आहारक मिश्र काययोग से प्रारम्भ करके आहारक काययोग के अस्तित्व के अन्तिम क्षण तक ग्राहारक शरीर व आहारक अंगोपांग भी नियम से उदित रहते हैं (धवल ७ १५४-५५ ) ग्रतः ग्राहारक शरीर व आहारक अंगोपांग तो युगपत् उदित होते हैं, प्राहारक तथा ग्राहारक मिश्र दोनों योगों में निरन्तर बने रहते हैं । जिनके मन:पर्यय, परिहारविशुद्धि या प्रथमोपशम सम्यक्त्व है उनके प्राहारक शरीर या प्रहारक अंगोपांग का निषेध भी स्वतः सिद्ध हो जाता है । इसी तरह यह भी जानना चाहिए कि मन:पर्ययज्ञानी, प्रथमोपशम सम्यक्त्वी या परिहारविशुद्धि ऋद्धिधारी के आहारक समुद्घात भी नहीं होता, क्योंकि आहारक समुद्घात का अर्थ होता है प्रदारिक शरीर से बाहर निकलता हुआ आहारक शरीर । अतः आहारक शरीर के अस्तित्व में जब शेष तीन नहीं होते तो आहारकसमुद्घात में वे शेष तीन ( मन:पर्यय ज्ञान, उपशम सम्यक्त्व, परिहारविशुद्धि ० ) कैसे हो सकते हैं ? ( धवल ७ ४३१,७१३५५,४५४) । आहारकमिश्र काययोगी के मन:पर्ययज्ञान, परिहारविशुद्धि संयम और उपशम सम्यक्त्व ये तीनों नहीं होते। यह ध्रुवसत्य है । ( धवल २।६६६ ) यही बात आहारक काययोगी के कहना चाहिए । इसी तरह ग्राहारक शरीर तथा अंगोपांग के साथ भी ये शेष तीन मन:पर्यय, परिहारविशुद्धि तथा उपशम सम्यक्त्व नहीं होते । [ धवल ७।६६६, धवल ६।३०५ श्रवल १४।२४६ ] ऐसे भी कहा जा सकता है कि आहारकद्विक, मन:पर्ययज्ञान, परिहारविशुद्धि संयम ये ऋद्धियां तथा उपशम सम्यक्त्व ये चार साथ-साथ नहीं होते, एक-एक ही होते हैं । ( धवल २७३५, धवल १४।२४७ ) विशेष इतना है कि उपशम सम्यक्त्व को आहारक शरीर का बन्ध तो होता है [ धवल ६३८० तथा जैन गजट दि० ५।१२।६६ | पर उदय नहीं हो सकता। इसी तरह मन:पर्ययज्ञादी ( श्रवल २६५-६६ ) तथा परिहार विशुद्धि संयमी भी श्राहारक शरीर का बन्ध कर सकते हैं, (धवल८३०७ ) मात्र उदय का निषेध है। शेष सब श्रागमानुसार जानकर कहना चाहिए। - ( ४ ) गाथा ८२ (पृ. १२६) की टीका व अर्थ में लिखा है कि कुर्मोनल योनि में तीर्थकर, दो प्रकार के चक्रवर्ती तथा बलभद्र उत्पन्न होते हैं। इस पर विशेष इतना जानना चाहिए कि जिस कुर्मोन योनि से भरत चक्रवर्ती उत्पन्न हुए थे उसी योनि से अन्य ६६ पुत्र ( भरत के भाई) भी उत्पन्न हुए थे। जिस कैकसी से रावण प्रतिवासुदेव उत्पन्न हुआ था, उसी से भानुकरणं तथा विभीषण भी उत्पन्न हुए (प० पु० पर्व ७ श्लोक १६४ से २२८ ) । जिस योनि से देवकी के कृष्ण (वासुदेव) हुए, उसी योनि से नृपदत्त, देवपाल, अनीकदत्त, घनीकपाल, शत्रुघ्न तथा जिऩशत्रु नामक [ २४ ]
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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