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________________ १४६ / गो. सा. जीवकाण्ड गाथा १०२ १०३ विषय के अनुसार ही है यतः यहाँ विशेषार्थ में उन्हीं सूत्रों का आधार लिया गया है। एक सूक्ष्मजीव से दूसरे सूक्ष्मजीव की श्रवगाहमा का गुणकार आवली का प्रसंख्यातवां भाग है। तात्पर्य यह है कि 'एक सूक्ष्मजीव से दूसरे सूक्ष्मजीव की अवगाहना असंख्यातगुणी है' ऐसा जहाँ भी कथन किया गया है वली का प्रसंख्यातवां भाग गुणकार होता है। सूक्ष्म से वादरजीव की प्रवगाहना का गुणकार पल्मोपम का असंख्यात बाँभाग है। सूक्ष्म एकेन्द्रिय की श्रवगाहना से जहां वादरजीव को अवगाहना संख्यातगुणी कही है वहाँ पत्योपम का असंख्यातवाँ भाग गुरपकार होता है । बादर से सूक्ष्म का अवगाहनागुरणकार श्रावली का प्रसंख्यातवाँ भाग है । बादर की अवगाहना से जहाँ सूक्ष्म एकेन्द्रिय की अवगाहना असंख्यातगुणी कही है वहाँ आवली का असंख्यातवभाग गुणकार होता है । बादर से वादर का अवगाहना - गुरणकार पल्योपम का असंख्यातवाँभाग है । वादर नामकर्म से युक्त जीवों का ग्रहरण होने से हीन्द्रियादि जीवों का भी ग्रहण होता है । एक बादरजीव से दूसरे बादरजीव की अवगाहना जहाँ असंख्यातगुणी होती है वहाँ पल्योपम का असंख्यातवाँभाग गुणकार होता है । कहीं पर एक बादरजीव से दूसरे बादरजीव की अवगाहना का गुणकार संख्यातसमय है । हीन्द्रियादिक निर्वृ' स्यपर्याप्तकों और उनके पर्याप्तकों में अवगाहना का गुणकार संख्यात समय होता है ।" सूक्ष्मनिगोदिया लक्ष्यपर्याप्तक की जघन्यमवगाहन से सूक्ष्म वायुकामिक की जघन्यश्रवगाहना की गुणकार ग्रावली के असंख्यातवें भाग की उत्पत्ति का क्रम तथा दोनों के मध्य की श्रवगाहनायों के भेदों का कथन अवरुवरि इगिपवेसे जुबे प्रसंखेज्जभागवढीए । श्रादी खिरंतर मदो एगेगपसपरिवढी ॥ १०२ ॥ प्रवरोग्गाहणमाणे जहणपरिमिदश्रसंखरा सिहिदे । प्रवरस्तुवर जेटुमसंखेज्जभागस्स ॥१०३॥ उढ्ढे गाथार्थ- जघन्य श्रवगाहना के प्रमाण में एक प्रदेश मिलाने से असंख्यात भागवृद्धि का प्रादिस्थान होता है। इसके ऊपर निरन्तर एक-एक प्रदेश की वृद्धि होती जाती है। जघन्य अवगाहना के प्रदेशों में जघन्य परीतासंख्यात का भाग देने से जो लब्ध श्रावे उतने प्रदेशों की वृद्धि हो जाने पर असंख्यात भागवृद्धि का उत्कृष्ट स्थान होता है ॥। १०२-१०३॥ ॥ विशेषार्थ- -इन दोनों गाथानों में जो विषय प्रतिपादित है वह ध. पु. ११ सु. २१ की टीका में है. अतः यहाँ विशेषार्थ में उसी को आधार बनाया है। पत्योपम के प्रसंख्यातवें भाग का विरलन करके घनांगुल को समखण्ड करके देने पर एक-एक रूप के प्रति सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव की जघन्य अवगाहना प्राप्त होती है । पश्चात् इसके आगे एक प्रदेश अधिक अवगाहना से निगोद पर्याय में ही स्थित जीव की प्रजधन्य अवगाहना होती है । यह द्वितीय श्रवगाहनाविकल्प श्रसंख्यातभागवृद्धि के द्वारा वृद्धिंगत हुआ है। वह इस प्रकार है— जघन्य अवगाहना का नीचे विरलन करके उपरि एक अंक के प्रति प्राप्त राशि को ( जघन्य अवगाहना को ) समखण्ड करके देने पर एकप्रदेश प्राप्त होता है । जघन्य अवगाहना के ऊपर दो प्रदेशों को बढ़ाकर स्थित जीव की द्वितीय अजघन्य अवगाहना होती है। यहाँ भी असंख्यातभागवृद्धि ही है। तीन प्रदेश अधिक जघन्य १. ध पु. ११ पृ. ६६-७० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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