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१२८/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा १
के भेद से इस प्रकार (१०) की; द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय ये तीन (३) बिकलत्रय, सर्व मिलकर (१४+१०+३) २७ भेद एकेन्द्रिय व विकलेन्द्रियसम्बन्धी हैं। इनमें से प्रत्येक पर्याप्त, नित्यपर्याप्त व सध्यपर्याप्त के भेद से तीन प्रकार का होता है। अतः २७ में ३ का गुणा करने पर एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रिय के (२७४३) १ भेद हो जाते हैं । कर्मभूमिज पंचेन्द्रियतिथंच जलचर, थलचर, नभचर में संजी व प्रसंज्ञी के भेद से छह प्रकार के हैं, इनके गर्भजों में पर्याप्त व निईत्यपर्माप्त की अपेक्षा १२ भेद तथा सम्मुर्छनों में पर्याप्त, नित्यपर्याप्त, लब्ध्यपर्याप्त की अपेक्षा १८ भेद हैं; उत्कृष्ट, मध्यम व जघन्य भोगभूमि के थलचर व नभचर पंचेन्द्रिय तियंचों में पर्याप्त, नित्यपर्याप्त को प्रपेक्षा १२ भेद, इस प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यसम्बन्धी {१२ + १८ + १२) कुल ४२ भेद होते हैं ।
आर्यखण्ड में लब्ध्यपप्तिक सम्मूछन मनुष्य होते हैं अतः सम्मूच्र्छन मनुष्यों का एक भेद; भायखण्डम्लेच्छखण्ड-उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य भोगभूमिज तथा कुभोग भूमिज मनुष्य ये छह प्रकार के ग प्रकार के भवनवासी देव, आठ प्रकार के वामध्यंतरदेव, पांच प्रकार के ज्योतिषीदेव और ६३ पटलों के वैमानिकदेव ये सब मिलकर (१० + + + ५ + ६३) ८६ प्रकार के देब और ४६ पाथड़ों के ४६ प्रकार के नारकी । इस प्रकार मनुष्य, देव और नारकी सम्बन्धी (६ + ८६ + ४६) १४१ भेद, पर्याप्त व नित्यपर्याप्त के भेद से (१४१४२) २८२ होते हैं । एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रिय के ८१, पंचेन्द्रिमतिर्यंच के ४२, सम्मूर्छन मनुष्य का १, गर्भजमनुष्य देव व नारकी के २८२, ये सब मिलकर (८१ + ४२ + १+२८२) ४०६ जीवसमास होते हैं।
इस प्रकार जीवसमास प्ररूपणा में स्थान का कपन पूर्ण हुप्रा ।
योनि अधिकार में प्राकृतियोनि के भेदों का कथन एवं शंखावतंयोनि में गर्मनिषेध प्ररूपण
'संखावत्तयजोणी कुम्मुण्णयसपत्तजोरणी य । तत्थ य संखावत्ते रिणयमा विवज्जदे गब्भो ॥१॥
गाथार्थ-शंखावर्तयोनि, कर्मोन्नतयोनि, वंशपत्रयोनि के भेद से प्राकृतियोनि तीन प्रकार की है। इनमें शंखावर्त योनि नियम से गर्भरहित होती है ।।१।।
विशेषार्थ-जिस योनि का आवर्त शंख के समान हो, वह शंखावर्त योनि है। जो योनि कूर्म (कछुए) की पीठ के समान उन्नत हो वह कुर्मोन्नतयोनि है। बांस के पत्ते के प्राकारवाली योनि वंशपत्रयोनि है। इनमें से शंखावतंयोनि में गर्भ का नियम से निषेध है। शंखावतंयोनिबाली स्त्रियाँ वंध्या (बाँझ) होती हैं। जैसे देवाङ्गना और चक्रवर्ती के चौदह रत्नों में से स्त्रीरत्न, ये नियम से वंध्या होती हैं।
शङ्का-गर्भ किसे कहते हैं ?
समाधान—'गर्भ: शुक्रशोगितगरणं' शुक और शोणित के गरण को गर्भ कहते हैं 1 मांखावर्तयोनि भोगभूमियों में नहीं होती।
१. मूलाचार पर्याप्ति अधिकार गा. ६१। प्राधार से।
२. श्री यमुनन्दि प्राचार्यकृत मूलाचार दीका एक म. प्र. टीका के