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________________ गाथा ६५ १०६/गो. सा. जीवकाण्ड अनुदय प्रकृतियों का सत्त्व न रहने से द्विचरमसमय में उनका क्षय कहा गया है । यह कथन उत्पादानुच्छेद की अपेक्षा किया गया है। विचरमसमय में सत्त्व से व्युच्छिन्न होने वाली प्रकृतियाँ देवगति, पाँच शरीर, पाँच शरीरबन्धन, पाँच शरीरसंघात, छह संस्थान, तीन अगोपांग, छह संहनन, पाँच वर्ण, दो गन्ध, पात्र रस. पाठ स्पर्ण, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपधात, परघात, उच्छवास, प्रशस्तबिह्मयोगति, प्रत्येकशरीर, अपर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुस्वर, दु:स्वर, दुर्भग, अनादेय, दया कीलि, गिर्जा नीतगो मोर को भेदनीयों में से अनुदय प्राप्त एक वेदनीय : ये ७२ प्रकृतियाँ अयोगकेवली के द्विचरमसमय पर्यन्त होती हैं, किन्तु इन ७२ प्रकृतियों के अतिरिक्त मनुष्यगत्यानुपूर्वी भी अनुदय प्रकृति है । अत: श्री वोरसेनस्वामी ने इस प्रकृति की भी सत्त्वव्युच्छित्ति द्विचरमसमय में बतलायी है। (धवल पुस्तक ६।४१७) उदयरूप एक वेदनीय, मनुष्यगति, मनुष्यायु, पञ्चेन्द्रिय जाति, स, बादर, पर्याप्त, सुभग, प्रादेय, यश-कीर्ति, तोर्थकर और उच्चगोत्र ये बारह प्रकृतियाँ प्रयोगकेवली के अन्तिम समय में ब्युच्छिन्न होती हैं, किन्तु श्री जिनसेनाचार्य ने मनुष्यगत्यानुपूर्वी सहित तेरह प्रकृतियों की व्युच्छित्ति बतलाई है। मनुष्यगति के साथ-साथ ही मनुष्यगत्यानुपूर्वी का भी बन्ध होता है। अत: मनुष्यगति के साथ हो मनुष्यगत्यानुपूर्वी की सत्त्वव्युच्छित्ति कही गई है। __जिनके योग विद्यमान नहीं है. अतिक्रान्त कर गया है वे अयोगी हैं, जिनके केवलज्ञान पाया जाता हैं वे केवली हैं जो योगरहित होते हुए केवली होते हैं वे अयोगकेवली हैं। शंका-सयोगकेवली के तो मन है, अतः उनके तो केवलज्ञान सम्भब है, किन्तु अयोगकेवली के मन के अभाव में केवलज्ञान कैसे सम्भव है ? समाधान—यह कहना ठोक नहीं है, क्योंकि ज्ञानावरण कर्म के क्षय से जो ज्ञान उत्पन्न हुना है और जो अक्रमवर्ती है, उसकी मन से उत्पत्ति मानना विरुद्ध है। शंका---जिस प्रकार मति आदि ज्ञान, स्वयं ज्ञान होने से अपनी उत्पत्ति में कारक की अपेक्षा रखते हैं, उसी प्रकार केवलज्ञान भी ज्ञान है, अतएव उसको भी अपनी उत्पत्ति में कारक को अपेक्षा रखनी चाहिए। समाधान नहीं, क्योंकि क्षायिक और क्षायोपशमिक ज्ञान में साधर्म्य नहीं पाया जाता। शङ्का-- अपरिवर्तनशील केवलज्ञान प्रत्येक समय में परिवर्तनशील पदार्थों को कैसे जानता है ? समाधान-ऐसी शंका ठीक नहीं है, क्योंकि पदार्थों को जानने के लिए तदनुकल परिवर्तन करने वाले केवलज्ञान के ऐसे परिवर्तन के मान लेने में कोई विरोध नहीं पाता है। शङ्का--जेय की परतन्त्रता से परिवर्तन करने वाले केवलज्ञान की फिर से उत्पत्ति क्यों नहीं मानी जाय ? समाधान--नहीं, क्योंकि केवल उपयोग सामान्य की अपेक्षा केवलज्ञान की पुनः उत्पत्ति नहीं होती है। विशेष की अपेक्षा उसकी उत्पत्ति होते हुए भी वह विशेष केवलज्ञान इन्द्रिय, मन और आलोक
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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