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________________ गाथा ६६-६७ गुरणस्थान/१०७ से उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि जिसके केवलज्ञानावरणादि कर्म नष्ट हो गये हैं, ऐसे केवलज्ञान में इन्द्रियादिक की सहायता मानने में विरोध प्राप्ता है। शा-यदि केवलज्ञान असहाय है, तो वह प्रमेय को भी न जाने ? समाधान--ऐसा नहीं है, क्योंकि पदार्थों का जानना उसका स्वभाव है और वस्तु के स्वभाव दूसरों के प्रश्नों के योग्य नहीं हुया करते हैं। यदि स्वभाव में भी प्रश्न होने लगे तो फिर वस्तुओं की व्यवस्था ही नहीं बन सकती। (धवल पु. १ पृ. १६८-१९६) चौदह गुणस्यानों में होने वाली प्रायुकर्म के बिना शेष सात कर्मों की गुणश्रेणी निर्जरा सम्मत्तुप्पत्तीये सावय-विरदे परातकम्मंसे । दसणमोहक्खवगे फसाय-उवसामगे य उपसंते ॥६६॥ खवगे य खीरणमोहे, जिणेसु वन्या असंखगुणिवकमा। तविवरीया काला संखेज्जगुणषकमा होंति ॥६॥' गाथार्थ—सम्यक्त्वोत्पत्ति अर्थात सातिशय मिथ्याष्टि, श्रावक अर्थात् देशवती. विरत अर्थात महादती, अनन्तानुबन्धी कषाय का विसंयोजन करने वाला, दर्शनमोह का क्षय करने वाला, चारित्रमोह का उपशम करने वाला, उपशान्तकषाय, चारित्रमोह का क्षपण करने वाला, क्षीणमोह, स्वस्थानजिन और योगनिरोध करने वाले जिन, इन स्थानों में उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी निर्जरा होती है, परन्तु निर्जरा का काल (गुणश्रेणी प्रआयाम) उससे विपरीत है अर्थात् आगे से पीछे की ओर बढ़ता हुआ है जो संख्यातगुणितहीन श्रेणिरूप है ।। ६६-६७॥ विशेषार्थ—ये दोनों गाथाएँ निर्जीर्ण होने वाले प्रदेश और काल मे विशेषित ग्यारह गुणश्रेणियों का कथन करती हैं। 'विशुद्धियों के द्वारा अनुभागक्षय होता है और उससे प्रदेशनिर्जरा होती है। इस बात का ज्ञान कराने से जीव और कर्म के सम्बन्ध का कारण अनुभाग ही है, इस बात को बतलाने के लिए उक्त कथन किया गया है । गुणश्रेणीनिर्जरा का कारण भाव है । 'सम्मत्तप्पत्ती' अर्थात् दर्शनमोह का उपशम करके प्रथमसम्यक्त्व की उत्पत्ति का उपाय । 'सावय' अर्थात् देशविरति । 'विरदें' अर्थात् संयत । प्रणतकम्मसे' अर्थात् अनन्तानुबन्धी कषाय की विसयोजना करने वाला । 'दसणमोहाखवगे' अर्थात् दर्शनमोह की क्षपणा करनेवाला । 'कसायउवसामगे' अर्थात् चारित्रमोहनीय का उपशम करने वाले। 'उवसंते' अर्थात् उपशान्त कषाय । 'खवगे' चारित्रमोह की क्षपणा करने वाला । 'खीरगमोहे क्षीणकषाय । “जिगेस' अर्थात् स्वस्थानजिन और योगनिरोध में प्रवर्तमानजिन । इस प्रकार इन गाथाओं १. ये दोनों गाथाएँ ध. पु१२ पृ. ७८ प्रथम चूलिकारूप से दी गई है। वहाँ पाठ इस प्रकार है - "सम्मत्तुप्पत्ती वि य सावयविरदे अण्तकम्मसे । दसगमोहक्खवए कसायउवसामए य उवसते ॥ ७ 11 खबए य स्रीणमोहे जिणे य शियमा भवे असंखेज्जा । तन्धिखरीदो कालो संखेजगुणाप य सेडीए 11 ८ ॥" २. घ. पु. १२ पृ. ७६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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