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१०४/गो. सा. औषकाण्ड
माथा ६५
को पराकाष्ठा में अधिष्ठित हैं। इस प्रकार सयोगकेवली के सकलगुण और शील प्रगट हो गये हैं, यह स्वीकार है, किन्तु उनके योग के निमित्त से होने वाले प्रास्तब मात्र के सत्त्व की अपेक्षा सम्पूर्ण कर्मनिर्जरा रूप फल वाला सकल संवर नहीं उत्पन्न हुआ है, जबकि अयोगकेवली ने समस्त प्रास्रवों के द्वार रोक दिये हैं और प्रतिपक्ष रहित प्रात्मलाभ प्राप्त कर लिया है, इस अभिप्राय से 'मौलेश्य' विशेषण प्रयोगकेवली के साथ लगाया गया है, इसमें कोई दोष भी नहीं है।'
शील के १८००० भेदों का स्वामित्व-प्राधिपत्य अयोगकेवली प्राप्त करते हैं। शील के १८००० भेदों को मूलाचार में इस प्रकार बताया है--
ओए करणे सपणा, इंदिय भोम्मादि समणधम्मे य ।
अण्णोष्णेहि प्रभत्था, अट्ठारससील सहस्साई॥ तीन योग, तीन करण, चार संज्ञा, पाँच इन्द्रिय, दस पृथिबोकायिक प्रादि जीवभेद, उत्तमक्षमादि दशधर्म इनको परस्पर गुणा करने से (३४३४४४५४१०x१०) शील के १८००० भेद होते हैं। प्राचारसार अधिकार १२ में भी कहा है
धर्मगुप्तिभिः करणसंज्ञाऽक्ष-प्राणसंयमैः ।
अष्टादशसहस्राणि शोलान्यन्योन्यसंगुणैः ॥२॥ १० धर्म, ३ गुप्ति, ३ करण, ४ संज्ञा, ५ इन्द्रिय और १० प्राणसंयम (१०४३४३४४४५४१०) इनको परस्पर गुणा करने पर शील के १८००० भेद होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार से भी गोल के १८००० भेद जिनागम में बताये गये हैं।
दुसरा विशेषण है--णिरुद्धणिस्सेस प्रासयों' अर्थात् समस्त प्रास्रव का निरोध कर देने से नवीन कर्मों का परम संवर हो गया है। मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद और कषाय से जिन कर्मों का आस्रव होता था, उन कमों के आस्रव का निरोध अधस्तन गुणस्थानों में हो गया। योग से पासव होता था उसका भी प्रयोगकेवली के अभाव हो गया, इसलिए प्रयोगकेवली के अशेष प्रास्रव का निरोध हो जाने से यह विशेषण सिद्ध हो जाता है।
तीसरा विशेषण है- "कम्मरविप्पमुषको' बन्ध के हेतुभुत आस्रव का निरवशेषरूप से निरोध हो जाने से तथा सत्त्वरूप कर्मों का प्रतिसमय अधःस्थिति गलन के कारण निर्जीर्ण होने से प्रयोगकेबली कमरज से विमुक्त हैं। अथवा नवीन कर्मरज से लिप्त न होने के कारण कर्मरज से विमुक्त हैं।
शङ्कर-पुरातनकर्म अपना फल देकर प्रकर्मभाव को प्राप्त होते हैं, उनके फलस्वरूप जो प्रात्मपरिणाम होते हैं, उन परिणामो के कारण अयोगकेवली कर्मरज से लिप्त होने चाहिए थे।
समाधान नहीं, मोहनीयकर्म का अभाव हो जाने से शेष चार अघातिया कर्म निःशक्त हो जाते हैं, अत: वे अपना कार्य करने में असमर्थ हैं।
१. ज.प. मूल पृ. २२६२ एवं ज.प. १६/१८३।