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________________ माथा ६३-६४ गुगाम्यान /६५ होतो हुई इस समय उमसे भी अच्छी तरह अपवर्तना करके अपूर्व स्पर्धकरूप से परिणमाता है । इस क्रिया की अपूर्व-स्पर्धककरण संज्ञा है । अब इस करग की प्ररूपा करने के लिये यहाँ पर सर्व। प्रथम पूर्व स्पर्धकों की जगश्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमारण रचना करनी चाहिए। ऐसा करने पर सूक्ष्म निगोद जीव के जघन्य स्थान से सम्बन्ध रखने वाले स्पर्धकों से ये स्पर्धक असंस्थानगुगणे हीन होकर अवस्थित हैं, अन्यथा उससे (सूक्ष्मनिगोदजीव के जघन्य स्थान सम्बन्धी स्पर्धकों से) इसका (सयोगिकेवली के पूर्व-स्पर्धकों का) सुक्ष्मपना नहीं बन सकता। इस प्रकार स्थापित इन पूर्वस्पर्धकों के नीचे असंख्यातगुणहानिरूप अपकषित कर अपूर्व स्पधंकों की रचना करते हुए योग निरोध करने बाले इस सयोगिकेवली जिन के प्ररूपणाप्रबन्ध को अगले सूत्र के अनुसार बतलाबगे-- [योगनिरोध करने वाला यह सयोगिकेवली जीव] पूर्व स्पर्धकों की प्रादि वर्गणा के अविभागप्रतिस्छेदों के प्रसंस्थातवें भाग का अपकर्षण करता है । पूर्वस्पर्धकों से जीव-प्रदेशों का अपकर्षगा करके अपूर्व स्पर्धकों की रचना करता हुअा पूर्व स्पर्धकों की आदिवर्गणा के अविभागप्रतिच्छेदों का असंख्यातवें भाग रूप से अपकर्षण करता है। इस प्रकार इस सूत्र का अर्थ के साथ सम्बन्ध है। पूर्वस्पर्धकों की प्रादिवर्गणा के अविभागप्रतिच्छेदों से असंख्यातगुणे होन अविभागप्रतिच्छेदरूप से जो वप्रदेशों का अपकर्षगा करके अपूर्व स्पर्धकों की रचना करता है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है, क्योंकि अपूर्व स्पर्धकों की अन्तिम वर्गणा के अविभागप्रतिच्छेदों में पूर्वस्पर्धकों की प्रादिवर्गणा से असंख्यात गुगाहानि का नियम देखा जाता है। यहाँ पर प्रसंख्यात गुगाहानि का भागहार पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण है और वह जोव जीवप्रदेशों के प्रसंख्यातवें भाग का अपकर्षण करता है। पूर्वस्पर्धक की राब वर्गगणानों से, जीबप्रदेशों के असंख्यातवें भाग का अपकर्षण भागहाररूप प्रतिभाग से, अपकर्षगा करके पूर्वोक्त अविभागप्रतिच्छेदशक्तिरूप से परिणमा कर उन अपूर्व स्पर्धकों की रचना करता है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है। और इस प्रकार अपकर्षित किये गये जीवप्रदेशों का अपूर्वस्पर्धकों में निषेक-विन्यास का क्रम कहते हैं। यथा-प्रथम समय में जीवप्रदेशों के असंख्यातवें भाग का अपकर्षण करके अपूर्वस्पर्धकों की आदिवर्गरणा में जीवप्रदेशों के बहुभाग का मिचम करता है. क्योंकि सबसे जघन्य शक्ति में परिणामन करने वाले जीवप्रदेशों के बहुत सम्भव होने में विरोध का प्रभाव है । दूसरी वर्गगा में विशेषहीन जीवप्रदेशों को जगश्रेणी के असंख्यातवें भागरूप प्रतिभाग के अनुसार सिंचित करता है। इस प्रकार सिंचित करता हुया अपूर्वस्पर्धकों को अन्तिम वर्गगा के प्राप्त होने तक जाता है। पुनः अपूर्वस्पर्धक की अन्तिम वर्गरणा से पूर्वस्पर्धकों की प्रादिवर्गणा में असंख्यातगुणहीन जीवप्रदेशों को सिंचित करता है । यहाँ पर हानि का गुणकार पस्योपम के असंख्यातबै भागप्रमाण होता हुआ भी साधिक अपकर्षण-उत्कर्षण भागहारप्रमाण होता है, ऐसा जानना चाहिये। इसके कारण की गवेषणा सुगम है। उससे आगे समय के अबिरोधपूर्वक विशेष हानिरूप जीवप्रदेशों के विन्यासक्रम को जानना चाहिए। इस प्रकार यह प्ररूपा अपूर्वस्पर्धकों को करने वाले के प्रथम समय में होती है। इसी प्रकार द्वितीय प्रादि समयों में भी अन्तर्मुहुर्त काल तक अपूर्वस्पर्धकों को समय के अविरोधपूर्वक रचना करता है । इस प्रकार इस अर्थ को स्पष्ट करते हुए पागे के सूत्र को कहते हैं
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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