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________________ १६ गो.मा. जीवकाण्ड गाथा ६३-६४ इस प्रकार अन्तमुहूर्त काल तक अपूर्व स्पर्धकों को करता है।' यह सूत्र सुगम है। परन्तु उन स्पर्धकों को प्रत्येक समय में असंख्यातगुणहीनक्रम से रचता है। इस बात का ज्ञान कराने के लिये इस सूत्र को कहते हैं---- __उन अपूर्व स्पर्धकों को प्रसंख्यातगुरगहीनश्रेणी रूप से और जीवप्रदेशों की संख्यातगुणीश्रेणी रूप से रचना करता है। इस सूत्र का भावार्थ--प्रथम समय में रचे गये अपूर्व स्पर्धकों से असंख्यातगुणहीन अपूर्वस्पर्धक दूसरे समय में उनसे नीचे रचता है । पुन: दूसरे समय में रचे गये अपूर्व स्पर्धकों से असंख्यातगुणे हीन अन्य अपूर्व स्पर्धकों को उनसे नीचे तीसरे समय में रचता है । इस प्रकार प्रसंख्यात मुरगहीन श्रेणी रूप से अन्तर्मुहुर्तकाल के अन्तिम समय तक जानना चाहिए । परन्तु जीवप्रदेशों की असंख्यातगुरगी श्रेणिरूप से अपकर्षणापत होती है, न पचम भाग में अपना पिद जिगे गये प्रदेशों से दूसरे समय में अपकर्षित किये जाने वाले प्रदेशों की असंख्यातगुरण प्रमाण से प्रवृत्ति देखी जाती है। इसी प्रकार तीसरे आदि समयों में भी असंख्यातगुणी श्रेणिरूप से जीवप्रदेशों की अपकर्षणा जाननी चाहिए। अब द्वितीयादि समयों में भी अपकर्षित किये गये जीवप्रदेशों की निषकसम्बन्धी श्रेणिप्ररूपणा इस प्रकार जाननी चाहिए । यथा--प्रथम समय में अपकषित किये गये जीवप्रदेशों से असंख्यातगुणे जीवप्रदेशों को इस समय अपकर्षित करके दूसरे समय में रचे जाने वाले अपूर्व स्पर्धकों की प्रादि वर्गणा में बहुत जीवप्रदेश्यों को रचता है। उसके प्रागे अपूर्व स्पर्धकों की अन्तिम वर्गरणा के प्राप्त होने तक विशेषहीन-विशेषहीन रचता है। पूनः प्रथम समय में रचे गये अपूर्व स्पर्धकों में जो जघन्य स्पर्धक है उसकी प्रादिवर्गणा में असंख्यातगुणहीन जीवप्रदेशों को निक्षिप्त करता है। उससे प्रागे सर्वत्र विषहीन जीवप्रदेश निक्षिप्त करता है। इसी प्रकार तृतीयादि समयों में भी अपकर्षित किये जाने वाले जीवप्रदेशों की यही निषेकप्ररूपणा इसी रूप से जाननी चाहिए । अब इस सब काल के द्वारा रचे गये अपूर्व स्पर्धकों का प्रमाण इतना होता है, इस बात का कथन करते हुए आगे के सूत्र को कहते हैं . ये सब अपूर्व स्पर्धक जगश्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । यह सूत्र सुगम है। वे सब अपूर्व स्पर्धक जगश्रेणी के वर्गमूल के भी असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । शङ्का-इसका क्या कारण है ? समाधान—क्योंकि इनसे असंख्यातगुग्गे पूर्वस्पर्धकों के भी जगश्रेणी के प्रथम वर्गमूल के असंख्यातवें भागप्रमाणपने का निर्णय होता है । अब ये अपूर्व स्पर्धक पूर्व स्पर्धकों के भी असंख्यातवें भागप्रमागा हैं इस बात का ज्ञान कराने वाले प्रागे के सूत्र को कहते हैं १. जयघवल मूल पृ. २२८५।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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