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________________ ६४ / गो. मा. जीवकाण्ड गाथा ६३-४६ न्द्रिय जीव और साधारण क्रम से वचनयोग और उच्छ्वास को जिस प्रकार धारण करते हैं उनके समान उनसे भी कम दोनों योगों को केवली भगवान् जीतते हैं ? जघन्य पर्याप्तक जिस प्रकार काययोग को धारण करते हैं उससे भी कम काययोग को केवली भगवान् जीतते हैं ||२|| इस प्रकार यथाक्रम बादर मनोयोग, बादर वचनयोग, बादर उच्छ्वास - निःश्वास और बादर काययोग की शक्तियों का निरोध करके इन योगों की सूक्ष्मपरिस्पन्दरूप शक्तियों को अव्यक्तरूप से शेष करके पुनः सूक्ष्म काययोग के व्यापार द्वारा सूक्ष्म शक्तियों को भी उनकी इस परिपाटी के अनुसार निरोध करते हैं, इस बात का ज्ञान कराने के लिये आगे के सूत्रप्रबन्ध को कहते हैं--- उसके बाद अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म काययोग के द्वारा सूक्ष्म मनोयोग का निरोध करता है। यहाँ पर सूक्ष्मयोग ऐसा कहने पर संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त के सबसे जघन्य मनोयोग परिणाम से असंख्यातगुरगाहोन अवक्तव्यस्वरूप द्रव्य मननिमित्तक जीवप्रदेश परिस्पन्द का ग्रहण करना चाहिए | उसका निरोध करता है-नाश करता है यह उक्त कथन का तात्पर्य है । उसके बाद अन्तर्मुहूर्त काल से सूक्ष्म काययोग के द्वारा सूक्ष्म वचनयोग का निरोध करता है । यहाँ पर भी सूक्ष्म बचनयोग ऐसा कहने पर द्वीन्द्रिय पर्याप्तक के सबसे जघन्य वचन योगशक्ति होनरूप भक्ति करनी चाहिए। अन्य शेष कथन सुगम है । से नीचे Ta उसके बाद श्रन्तमुहूर्तकाल से सूक्ष्मकाययोग के द्वारा सूक्ष्म उच्छ्वास का निरोध करता है ।' यहाँ भी उच्छ्वास शक्ति का सूक्ष्मपना सूक्ष्म निगोद पर्याप्तक जीव के सब से जघन्य होता है । उसरूप परिणाम से नीचे इस सयोगिकेवली की उच्छ्वासशक्ति असंख्यातगुणो हीन रूप से जाननी चाहिए | इस प्रकार यह योगनिरोध करने वाला केवली जिन सूक्ष्म काययोग के द्वारा परिस्पन्दात्मक क्रिया करते हुए मन, वचन और उच्छ्वास निःश्वास की सूक्ष्म शक्तियों का भी यथोक्तक्रम से निरोध करके पुनः सूक्ष्मकाययोग का भी निरोध करते हुए योगनिरोधनिमित्तक इन करणों को करता है, इस बात का ज्ञान कराने के लिये गला सूत्रप्रबन्ध याया है उसके बाद अन्तर्मुहूर्तकाल जाकर सूक्ष्म काययोग के द्वारा सूक्ष्म काययोग का निरोध करता हुआ इन करणों को करता है । उसके बाद अन्तर्मुहूर्त काल जाकर सूक्ष्म काययोग के बल से उसी सूक्ष्म काययोग का निरोध करता हुआ वहाँ सर्व प्रथम अनन्तर कहे जाने वाले इन कारणों को प्रबुद्धिपूर्वक हो प्रवृत्त करता है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है । परन्तु वे करा कौन हैं ऐसी आशंका होने पर कहते हैं प्रथम समय में पूर्व स्पर्धकों को नीचे करके अपूर्व स्पर्धकों को करता है । पूर्व स्पर्धकों से नीचे इससे पूर्व अवस्था में सूक्ष्म काययोग की परिस्पन्दरूप शक्ति को सूक्ष्म निगोद के जघन्य योग से प्रसंख्यातगुणी हानि रूप से परिणामाकर पूर्व स्पर्धकस्वरूप ही होकर प्रवृत्त १. जयथबल मूल पृ. २२८४ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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