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८२गो, सा. जीवकागड
गाथा ६३-६४
में छूट जाने वाला है, बन्ध का कारण है और बिषम है । वास्तव में, वह सदाकाल दुःखस्वरूप ही है ।।२।।
जो मुख विरागभाव को निमित्त कर नहीं उत्पन्न हुआ है वह कुछ भी नहीं है, ऐसा हम निश्चय करके स्थित हैं। यदि वह निमित्त है तो आपके सिवाय बह स्पष्ट रूप से अन्य नहीं ही है जिससे कि आप में ही केवल निमित्त रूप से अस्तित्व है ।।३।।
इसलिये जिसमें अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तवीर्य और अनन्तविरति की प्रधानता है जो अनुपरत वृत्तिवाला है : निरतिशय है, स्वभावभूत प्रात्मा को उपादान करके जो सिद्ध होता है, अतीन्द्रिय है और जो द्वन्द्वभाव से रहित है, वह अनन्तमुख है। इससे असातावेदनीय के उदय का । सद्भाव होने से सयोगकेवली भगवान् में अनन्तसुखाभाव और उसके साथ होने वाली कवलाहारवृत्ति का निश्चय करनेवाला वादी निराकृत हो गया है, क्योंकि उसमें उस (असातावेदनीय) का उदय सहकारी कारणों की विफलता के कारण परघात के उदय के समान अकिंचित्कर है। इसलिये उनके अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तवीर्य, अनन्तविरति और अनन्तसुखपरिणामपना होने से सयोगकेवली भगवान् सिद्धपरमेष्ठी के समान भोजन नहीं करते हैं, यह सिद्ध होता है ।
अनन्तवीर्य को उपलक्षण करके पूरे अन्तरायकर्म के क्षय से अनन्तदान, अनन्तलाभ, अनन्तभोग और अनन्त-उपभोगरूप लब्धियाँ उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि अनन्तवीर्य के समान उन लब्धियों की उत्पत्ति के प्रति कोई विशेषता नहीं है । परन्तु वे लब्धियाँ समस्त प्राणीविषयक अभयदान की सामर्थ्य के कारण, तीनों लोकों के अधिपतित्व का सम्पादन करने से तथा प्रयोजन के रहते हुए स्वाधीन अशेष भोगोपभोग सम्बन्धी बस्तुओं का सम्पादन होने से उपयोगसहित ही हैं, ऐसा जानना चाहिए। इसलिये पहले ही दोनों प्रकार के मोहनीय कर्म के क्षयसे जिसने प्रात्यन्तिक सम्यग्दर्शन और सम्यकचारित्र की शुद्धि को प्राप्त किया है. ज्ञानावरण और दर्शनाबरणरूप मूल और उत्तर प्रकृतियों के क्षय के अनन्तर ही जिसकी क्षायिक अनन्तकेवल ज्ञान और क्षायिक अनन्त केवलदर्शन पर्याय प्रकटित हुई है, तथा अन्तराय कर्म के क्षय से जो अनन्तवीर्य, अनन्तदान, अनन्तलाभ, अनन्तभोग और अनन्त-उपभोगरूप नौ केवल-लब्धियोंरूप से परिणत हुआ है, वह कृतार्थता की परमकाष्ठा को प्राप्त होता हा अहत्परमेष्टी, स्वयम्भू, जिन, केवली. सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और सयोगकेवली इस रूप से कहा जाता है । यहाँ जिनादिरूप शब्दों की पदार्थ-व्याख्या संगम है, इसलिये उनका विस्तार नहीं करते हैं।
"वे भगवान् महत्परमेष्ठीदेव प्रसंख्यातगुणी श्रेणिरूप से प्रदेशपुज की निर्जरा करते हुए विहार करते हैं।" इस सुत्र का अर्थ यह है कि प्रतिसमय असंख्यातगुणी श्रेणिरूप से कर्मप्रदेशों को ये भगवान् धुनते हुए धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति के लिये यथायोग्य धर्मक्षेत्र में देवों और असुरों से अनुगत होते हुए बड़ी भारी विभूति के साथ प्रशस्त विहायोगति के निमित्त से या विहार करनेरूप स्वभाव वाले होने से विहार करते हैं।
__ शङ्का-कदाचित् यह मत हो कि इन ग्रहत्परमेष्ठी भगवान का व्यापारातिशय और उपदेश रूप अनिणय अभिप्रायपूर्वक ही हो सकता है, अन्यथा यत्किचित् करने रूप दोष का अनुषंग प्राप्त
१. जयप्रवल मूल पृ. २२७० ।