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७४/ गो. सा. जीवकाण्ड
गाया ६१
कर्मों का स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त प्रमारा होता है। नाम और गोत्र कर्मों का स्थितिबन्ध सोलह मुहूर्तप्रमाण होता है । वेदनीय कर्म का स्थितिबन्ध चौबीस मुहूर्तप्रमारण होता है । तदनन्तर समय में सम्पूर्ण मोहनीय कर्म उपशान्त हो जाता है । '
वाय-फाय - श्रणुभागावी अनंतगुणहोणे । लहाणुहि दियो हंद सुम- संपराश्री सो ॥१२१॥
- पूर्वस्पर्धक और अपूर्वस्पर्धक के अनुभाग से अनन्तगुणे हीन अनुभाग वाले सूक्ष्मलोभ में जो स्थित है, उसे सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती समझना चाहिए ||१२१ ।।
उपशान्तकषाय गुणस्थान का स्वरूप
'कदकफलजुदजलं वा सरए सरबारियं व रिणम्मलयं । सयलोवसंत मोहो उवसंतकसायनो
होदि ॥ ६१ ॥
गाथार्थ - कतफल से युक्त निर्मल जल के समान अथवा शरद् ऋतु में होने वाले सरोवर के निर्मल जल के समान सम्पूर्ण मोहनीय कर्म के उपशम से उत्पन्न होने वाले निर्मल परिणामों की उपशान्तकपाय संज्ञा है ॥ ६१ ॥
विशेषार्थ - जिनकी कषायें उपशान्त हो गई हैं, वे उपशान्तकषाय जीव हैं, क्योंकि मोहनीय कर्म के बन्ध, उदय, उदीरणा, अपकर्षरण और उत्कर्षरण आदि सभी कररणों का उपशान्तरूप से अवस्थान देखा जाता है । अब यहाँ से लेकर अन्तर्मुहूर्तकाल तक उपशान्तकषाय- वीतराग छद्यस्थ होकर स्थित रहता है । समस्त कषायों के उपशान्त हो जाने से उपशान्तकषाय, समस्त राग परिणामों का उदय नष्ट हो जाने से वीतराग, छद्म प्रर्थात् ज्ञानावरण-दर्शनावरण स्थित होने से स्थ इस प्रकार उपणान्तकषाय- वीतराग छद्मस्थ होकर अन्तर्मुहूर्त काल तक ग्रत्यन्त स्वच्छ परिणामों के साथ प्रवस्थित रहता है।
शङ्का - अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल तक उपशान्तकाय भाव के साथ अवस्थित क्यों नहीं
रहता ?
समाधान- नहीं, क्योंकि अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल तक उपशम पर्याय का अवस्थान असम्भव है । समस्त उपशान्त काल में वह अवस्थित परिणाम वाला होता है, क्योंकि वहाँ परिणामों की हानि और वृद्धि के कारणभूत कषायोदय का प्रभाव है । अतः अवस्थित यथाख्यात विहारशुद्धिसंयम से युक्त सुविशुद्ध वीतराग परिणाम के साथ प्रतिसमय अभिन्नरूप से उपशान्तकपाथ वीतराग के काल का पालन करता है। अवस्थित परिणाम वाले जीव के अनवस्थित आयामरूप से तथा अनवस्थित प्रदेशपुरंज के अपकर्ष रूप से गुरणश्रेणी विन्यास सम्भव नहीं है, क्योंकि इसका निषेध है। इसलिए पुरे ही उपशान्त काल के भीतर किये जाने वाले गुणश्रेणी निक्षेप के आयाम की अपेक्षा और अपकर्षित
१. क. पा. त्रैणिसूत्र २८२ से २८५ । २. धवल पु. १ पृ. १८८ ।
३. सकयगहलं जलं वा सरए सरवारिष्यं व रिम्लए ।
समलोवसंत मोहो उन संत कसायनो होई ॥१२२॥
धवल पु. १ पृ. १८९ ।