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________________ - समरवृत्तान्तश्च] द्वितीयो लम्भः १२५ रितभाविपरिभवभीत्या च वरूथिनी रथकटयावलन वशजनितचीत्काररवेण करिकरटतटनियन्मदधारामस्नपिनस्थलिका प्रतिकूलवातकम्पितध्वजभुजलतरताडितकेतुयष्टिवक्षःस्थल प्रदेशा भृशमिरोहीन ७४. तत क्षणादेवाभ्येत्य काहाङ्गारचमूः काकपङ्क्तिः शृगालमिव स्वीकृतामिषमपहनगोपन व्याधमार्थ म्गेध । तदवलोकनजातक्रुधश्चमरवालरोमरचितरज्जूग्रथितके शपाशाः ५ ग.विपिन गनिन मगन मामा व्याघ्र ननिर्मिता|रुका, वराटिकाभरणभूषितवपुषः परिगृहीत. पादुका: ममागपितकामंकाः एमालाभ्यर्थितचण्डिकाः कण्ठदनपोतमधुमदलालसाः, शबरीजन ग्या' इति विमलोचन:, बरथिना गंना स्थानां समूहो रथकल्या 'खलगीरथात्' इत्याधिकारे 'इनिनकट्याचश्च' इत्यनेन समूहाथ कानप्रत्ययः, तम्य चलनवर्शन समरणशंन जनित: समुम्पनो यश्चीत्काररवोऽनुकरणशब्दविशेषस्तन करिणां गजानां कस्टनटेभ्यो गण्डस्थलती रंभ्या नियन्सी निर्गच्छता या भदधारा सैवास्राणि ? अश्रणित: स्नपिता स्थली वनमिया सा 'अनः कणेक सि क्लीवमणि शोणिते' इति मंदिनी । प्रतिकूलवातेन विरुद्धवायुना कम्पिता पिता ये ध्वजाः कंतवस्त एव भुजलता बाहुबल्लयस्तामिस्ताडिताः कंतुयष्टयः पताकादण्डा एव वक्षःस्थल प्रदेशा यया तथाभूसा सती भृशमत्यर्थम् अरोदीदिव चक्रन्देव । ४. तन इतेि. ततस्तदनन्तरं क्षणादेव अभ्येत्य सम्मुखमागत्य काष्टाङ्गारचमूः काकरितायसणिः स्वीकृतामिपं गृहीतमांस शृगालमिय गोमायुमिच, अपहृतं गोधनं येन सं मुषितधेनुधनं व्याध- १ सार्थ शबरसमूह रोध । तस्याः काष्टाङ्गारचम्बा अवलोकनेन जातकुधः समुत्पझकोपाः, चमराणां मृगविशेषाणां बालरोमभिः केशलोमी रचित रज्जुभिरुइथिता. केशपाशा येषां ते, केकिपिच्छैमयूरपिच्छरारचिता भण्डमाला शिरःला जो येस्ते, व्याघ्रचर्मभिनिमितान्यरकाणि-अधोवस्त्राणि येषां ते, पराटिकानां कादिकानामाभरणभूपितानि वपूंकि येषां ते, परिगृहीताः पादुका उपानहो यैस्ते, समारोपित्तानि समस्यचौफनानि कामुकाणि धषि येषां तं, भादौ पुरस्कृता उपहारैः पूजिता पश्चादभ्यथिता याचिता चण्डी २ यस, काठन कपठप्रमाणं पीत यन्मधु मयं तस्य मदे मोहे लालसा वान्छा येषां ते, शबरीजनैमिली भयसे वह सना, रथसमूह के चलनेसे उत्पन्न चीत्कार शब्दके द्वारा मानो अत्यधिक रोही। रही थी। हाथियों के गण्डस्थलसे निकालनेवाली मदकी धारा रूप आँसुओंसे उसने आस-पासकी भूमिको आनन्दादिम कर लिया था और प्रतिकूल वायुके द्वारा कम्पित भुजलताके द्वारा वह पनाकादशहा या घनःस्थल के प्रदेशका नाड़ित कर रही थी। ६७. नानान्तर क्षण-भर में सामने जाकर काष्ठाङ्गारकी सेनाने गोधनको अपहृत करनेवाले भीगक म मृहका उस प्रकार रोक लिया जिस प्रकार कि कौओंकी पंक्ति मांसकी डली रखनेवाल सियारका रोक लेती है । तत्पश्चात् सेनाके देखनेसे जिन्हें क्रोध उत्पन्न हो रहा था चमरी गायके बालरूपा मांस निमित रसीसे जिन्होंने बालोंका जटा ऊपरकी आर बाँध रखा था, जिनके मम्न कोही मालाएँ मथरके पिच्छसे निर्मित थीं, जिनके अधोवस्त्र व्याघ्रके चमड़े में बनाये गये थे, जिनके शरीर कौड़ियोंके आभूषणोंसे सुशोभित थे, जिन्होंने पैरोंमें चप्पल पहन रख श्रे. धनुष चढ़ा रखे थे, चण्डी देवोको भेंट देकर इष्ट वस्तुकी प्रार्थना कर रखी थी, कण्टपर्यन्त पिये हुए मधुके नशामें जिनकी लालसा बढ़ रही थीजो कण्ठपर्यन्त मदिरा पीकर उसके नशाकी प्रतीक्षा कर रहे थे, मिल्लियोंने जिन्हें आशीर्वाद ३ .-- . ..- ---. १.म० धारासपिहितस्यालपड़ा। w
SR No.090172
Book TitleGadyachintamani
Original Sutra AuthorVadibhsinhsuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1968
Total Pages495
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size20 MB
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