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________________ -श्वोपदेशः] द्वितीयो कम्मः १११ कुर्वन्ति कार्यम् । किमन्यदुदीर्यते ? स्वाभाविकाहंकारस्फारश्वयथुजातवेपथुविह्वला हि महीभृतां प्रकृतिः । प्रकृत्या तथाभूतानियं दुराचारप्रिया हरिप्रिया तु सुतरां खलयति । इयं हि पारिजातेन सह जातापि लोभिनां धौरेयो, शिशिरकरसोदरापि परसंतापविधिपरा, कौस्तुभमणिसाधारणप्रभवापि पुरुषोत्तमद्वेषिणी, पापर्धिरियं पापों, वेश्येयं पारवश्यकृती, द्यूतानुसंधिरियमतिसंधाने, मृगतृष्णिकेयं तृष्णायाम् । तथा चेयं शर्वरीव तमोऽधिष्ठिता परप्रकाशासहिष्णुस्वभावा च, ५ कुलटेव प्राप्तप्रद्वेषिणो परान्वेषिणी च, जलबुद्दाकृतिरिब जडप्रभावा क्षणमात्रदर्शितोन्नतिश्च, कुर्वन्तोऽपि फलपर्यन्तं फल सिद्धिं यावन् कार्य न कुर्वन्ति न विदधति । किमन्यत् किमितरत् उदीर्यते कथ्यते । हि निश्चयेन महीभृतां राज्ञां प्रकृतिः स्वभावः स्वाभाविकाहंकारस्य नैसर्गिकदर्पस्य यः स्फारश्वयथुरतिशैस्यं तेन जाती यो वेपधुः कम्पनं तेन विहला न्यग्रा मवतीति शेषः। प्रकृत्या निसर्माण तथाभूतान् तादृशान् नृपान दुराचारः प्रियो यस्यास्तथाभूता इयम् प्रथा हरिप्रिया 'कक्ष्मी: पद्मालया पमा कमला १० श्रीहरिप्रिया' इत्यमरः तु सुतरां सातिशयं खळयति खलं करोमि दाखीकोतीत्यर्थः। अथ लक्ष्म्या भव. गुणान् वर्णयितुमाह-इयमिति । इयं हि लक्ष्मी: पारिजातेन कल्पानोकहेन सह जातापि सहोल्पमा अपि लोभिनां धौरेयी धुरां वहतीति धौरेयी प्रवीणा 'धुरो यदकौ' इति हक । शिशिरकरसोदरापि चन्द्रसहोस्पयापि परसंतापविधिपरा अन्यजनसंतापकारिणी सातिशयसंतापोल्पादनपरा या। कौस्तुममणिसाधारणस्तत्तुल्यः प्रभवो यस्यास्तथाभूतापि पुरुषोत्तमद्वेषिणी नारायणद्वेषिणी पक्षे श्रेष्टजन द्वेषिणी, इयं लक्ष्मीः १५ पापी दुरितैश्वर्य पापढिराखेटम् , हयं पारवश्यक्ता पारतम्यविधाने वेश्या, इरम् अतिसंधाने वञ्चनातिशमे घुनानुपन्धिर्दुरदरानुसंधिः, इयम् तृष्णायामकब्धकामेच्छायाम् मृगतृपिणका मृगमरीचिका । तथा चेयमिति-तथा च किंच, इयं लक्ष्मी: शर्वरोव रजनीव तमोऽभिष्टिता तिमिरेण युक्ता पक्षे तमोगुणेन सहिता, परप्रकाशस्योत्कृष्लोकस्य पक्षेऽस्य जनमवस्थासहिष्णुः स्वभावो पस्यास्तथाभूताच, कुलटेव म्यमिचारिणोष प्राप्त प्रष्टीत्येवंशीला पक्षे प्राप्त पुरुषेऽसंतुष्टा पशम्शेषिणी चान्यजनमागिणी च, जलघुदबुदाकृतिरिव २० जलस्फोटाकृतिरिव डलयोरभेदाज जसे-जले प्रमाको यस्याः पक्षे जडेषु मूर्खषु प्रमावो यस्यास्तथाभूता, भी हैं तो फलको प्राप्ति पर्यन्त कार्य नहीं करते। और क्या कहा जाय ? राजाओंकी प्रकृति स्वाभाविक अहंकाररूपी अत्यधिक सूजनसे उत्पन्न कँपकँपीसे विह्वल हुआ करती है। स्वभावसे ही खल-दुर्जन-जैसा आचरण करनेवाले राजाओंको दुराचारसे प्रेम रखनेवाली लक्ष्मी और भी अधिक खल-दुर्जन बना देती है। यह लक्ष्मी कल्पवृक्ष के साथ उत्पन्न होकर २५ भी लोभियोंमें प्रमुख है, चन्द्रमाकी बहन होकर भी दूसरोंके लिए सन्ताप उत्पन्न करनेवाले कायों में तत्पर है, कौस्तुभमणिके साथ उत्पन्न होकर भी पुरुषोत्तम-नारायण (पक्षमें श्रेष्ठ पुरुष ) से द्वेष करने वाली है। यह पापकी ऋद्धि बढ़ाने में शिकार है, परवशता उत्पन्न करने में वेश्या है, ठगने में जुआके समान है, और तृष्णा बढ़ाने में मृग-मरीचिका है। यह लक्ष्मी रात्रिके समान है क्योंकि जिस प्रकार रात्रि तम-अन्धकारसे सहित और दूसरेके प्रकाशको नहीं ३० सहनेवाले स्वभावसे युक्त है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी तम-तमोगुणसे सहित और दूसरेके वैभवको नहीं सहनेवाले स्वभावसे युक्त है । अथवा यह लक्ष्मी कुलटा-व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है क्योंकि जिस प्रकार व्यभिचारिणी स्त्री प्राप्त पुरुषसे द्वेष रखती हुई दूसरे पुरुषकी खोज में तत्पर रहती हैं उसी प्रकार लक्ष्मी भी प्राप्त पुरुषके साथ द्वेष रखती हुई दूसरे पुरुषकी खोज में रहती है । अथवा पानीके बबूलाके समान है क्योंकि जिस प्रकार पानीका बबूला ३५ - - - - - १. क. ग. जडप्रभवा, ख० जडमात्रप्रभवा । - -
SR No.090172
Book TitleGadyachintamani
Original Sutra AuthorVadibhsinhsuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1968
Total Pages495
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size20 MB
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