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________________ (४६) नेमिजी तो केवलज्ञानी, ताहीको ध्याऊं ॥ टेक॥ अमल अखंडित चेतनमंडित, परमपदारथ पाऊं । नेमिजी. ॥१॥ अचल अबाधित निज गुण छाजत, वचनमें कैसे बताऊं।। नेमिजी. ॥ २॥ 'धानत' ध्याइये शिवपुर जाइये, बहरि न जगमें आऊं। नेभिजी. ॥३॥ श्री नेमिनाथ भगवान केवलज्ञानी हैं। मैं उनका ही स्मरण-चिन्तन व ध्यान करता हूँ। वे निर्मल, अखण्ड, पूर्ण चैतन्यस्वरूप हैं। ऐसे परम पदार्थ अर्थात् स्वरूप की प्राप्ति मुझे भी हो। वे निज गुणों से भरपूर, चंचलता-विहीन, स्थिर, सर्वबाधारहित हैं, मैं वचनों द्वारा उनका गुणगान कैसे करूँ? द्यानतराय कहते हैं कि जो उनका ध्यान करता है, उनको ध्याता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है। मैं भी वह मोक्षपद पाऊँ और फिर इस संसार में कभी भी न आऊँ इसलिए उनका ध्यान करता हूँ। द्यानत भजन सौरभ
SR No.090167
Book TitleDyanat Bhajan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTarachandra Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajkot
Publication Year
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Poem
File Size5 MB
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