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________________ (१५५) राग सारंग हम लागे आतमरामसों ॥ टेक॥ विनाशीक पुदगलकी छाया, कौन रमै धनमानसों ॥ हम.॥ समता सुख घटमें परगास्यो, कौन काज है कामसों। दुविधा-भाव जलांजुलि दीनौं, मेल भयो निज स्वामसों॥ हम.॥१॥ भेदज्ञान करि निज परि देख्यौ, कौन विलोकै चामसौं॥ उरै परैकी बात न भावै, लौ लाई गुणग्रामसौं । हम.॥२॥ विकलप भाव रंक सब भाजे, झरि चेतन अभिरामसों। 'धानत' आतम अनुभव करिकै, छूटे भव दुखधामसों ।। हम.।।३।। अब हमारी अपनी आत्मा से लगन लग रही है 1 जगत में जो कुछ दृश्य है वह सब पुद्गल द्रव्य है और वह सब विनाशी स्वभाववाला, विनाश होनेवाला है, हम सर्वगुणसम्पन्न हैं, धनी हैं, तब क्योंकर पर्यायों में, नष्ट होनेवाले पुद्गल की छाया में, रमण करें? हमारे अपने अन्तर में सुख है, यह तथ्य, यह सत्य प्रगट है । फिर काम से, तृष्णा से हमें क्या प्रयोजन है? जब से हमारा मिलन अपनी आत्मा से हुआ है, तब से संशय और दुविधा की स्थिति से छुटकारा हो गया है। स्व और पर के भेदज्ञान से सबकुछ स्पष्ट हो गया है, फिर इस देह को, चाम को क्या महत्त्व दें? इस भेद-ज्ञान के कारण इधर-उधर की कोई बात हमें रुचिकर नहीं लगती, क्योंकि हमारी रुचि तो अपने ही गुणों में है। उनकी अनुरक्ति ही भली लगती है। सारे विकल्प थोथे प्रतीत होते हैं, ये सब चेतन की मनोहारी झड़ी में धुल जाते हैं, हट जाते हैं। द्यानतराय कहते हैं कि जब आत्मा की अनुभूति होती है तो भव-भव के सारे दु:ख छूट जाते हैं, उसके आनन्द में विस्मृत होकर मिट जाते हैं। १८० धानत भजन सौरभ
SR No.090167
Book TitleDyanat Bhajan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTarachandra Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajkot
Publication Year
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Poem
File Size5 MB
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