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________________ ३६ द्रव्य संग्रह उपचार से एक पुद्गल परमाणु भी बहुप्रवेशी है एयपवेसो वि अणू णाणाखंधप्पवेसवो होदि । बहूवेसो उथयारा सेण य काओ भांति सम्वष्टु ॥ २६ ॥ अन्वयार्थ ( एयपदेशो वि) एक प्रदेशवाला भी । ( अणू ) पुद्गल परमाणु । ( णाणाखंधप्पदेसदी) नाना स्कन्धों का कारण होने से । ( बहुदेसो } बहुप्रदेश | ( होदि होता है। ( ब ) और ( तेण ) इसलिए | . ( सव्वण्डु ) सर्वज्ञदेव । ( उवयारा ) उपचार से । ( काओ) उसे काय अर्थात् बहुप्रदेशी । ( भांति ) कहते हैं । पुद्गल परमाणु एकप्रदेशो होता है, तो भी सर्वज्ञदेव ने उसे उपचार से बहुप्रदेशी कहा है 'क्योंकि वह नाना स्कन्ध रूप होने की योग्यता रखता है । प्र०-उपचार किसे कहते हैं ? उ०- किसी वस्तु को किसी निमित्त स्वभाव से भिन्न रूप कहना उपचार कहलाता है। जैसे— शुद्ध पुद्गल परमाणु स्वभाव से एक प्रदेशो है किन्तु अन्य के ( पुगलों के ) संयोग से यह ( संख्यात, असंख्यात, अनन्त) बहुप्रदेशो कहलाता है । प्र०- परमाणु स्कन्ध रूप किस गुण के कारण हो जाता है ? उ०- पुद्गल परमाणु में स्निग्ध-क्ष गुण पाये जाते हैं। स्निग्ध-स्निन्ध या स्निग्ध- रूक्ष या रूक्ष रूक्ष या रूक्ष- स्निग्ध गुण के परमाणु मिलने से परमाणु, स्कन्ध पर्याय को प्राप्त होता है । प्रदेश का लक्षण जाववियं आयासं अविभागीयुग्गलाण उदृद्धं । संखु पबेसं जाणे, सव्वाणुट्टाणदाणरिहं ॥२७॥ 1 बम्वयार्थ ( खावदिये ) जितना । ( आया ) आकाश | ( अविभागो पुग्गलाणु ) एक वविभागी अर्थात् जिसका दूसरा विभाग न हो सके ऐसे
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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