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________________ कारिका ११] देवागम 'प्रागभावका यदि लोप किया जाय-कार्यरूप द्रव्यका अपने उत्पादसे पहले उस कार्यरूपमें अभाव था, इस बातको न माना जाय तो वह कार्यरूप द्रव्य-घटादिक अथवा शब्दादिकअनादि ठहरता है-और अनादि वह है नहीं, एक समय उत्पन्न हुआ, यह बात प्रत्यक्ष है । यदि प्रध्वंस धर्मका लोप किया जायकार्यद्रव्यमें अपने उस कार्यरूपसे विनाशकी शक्ति है और इसलिए वह बादको किसी समय प्रध्वंसाभावरूप भी होता है, इस बातको यदि न माना जाय—तो वह कार्यरूप द्रव्य-घटादिक अथवा शब्दादिक-अनन्तता-अविनाशिताको प्राप्त होता है-और अविनाशी वह है नहीं, यह प्रत्यक्ष सिद्ध होता है, प्रत्यक्षमें घटादिक तथा शब्दादिक कार्योंका विनाश होते देखा जाता है। अतः प्रागभाव और प्रध्वंसाभावका लोप करके कार्यद्रव्यको उत्पत्ति और विनाश-विहीन सदासे एक ही रूपमें स्थिर ( सर्वथा नित्य ) मानना प्रत्यक्ष-विरोधके दोषसे दूषित है और इसलिए प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभावका लोप किसी तरह भी समुचित नहीं कहा जा सकता । इन अभावोंको मानना ही होगा।' अन्योऽन्याभाव-अत्यन्ताभावके विलोपमें दोष सर्वात्मकं तदेकं स्यादन्याऽपोह-व्यतिक्रमे । अन्यत्र समवाये न व्यपदिश्येत सर्वथा ॥११॥ 'यदि अन्याऽपोहका--अन्योन्याभावरूप पदार्थका–व्यतिकम किया जाय-वस्तुके एक रूपका दूसरे रूपमें अथवा एक वस्तुका दूसरी वस्तुमें अभाव है, इस बातको न माना जाय तो वह प्रवादियोंका विवक्षित अपना-अपना इष्ट एक तत्त्व ( अनिष्टतत्त्वोंका भी उसमें सद्भाव होनेसे ) अभेदरूप सर्वात्मक ठहरता हैऔर इसलिए उसकी अलगसे कोई व्यवस्था नहीं बन सकती।
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
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