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________________ समन्तभद्र-भारती [परिच्छेद १ अनेकान्तको परमागमका बीज और लोकका अद्वितीय गुरु कहा गया है-वह सबोंके लिये सन्मार्ग-प्रदर्शक है' । जैनी नीतिका भी वही मूलाधार है। जो लोग अनेकान्तका सचमुच आश्रय लेते हैं वे कभी स्व-पर-वैरी नहीं होते, उनसे पाप नहीं बनते, उन्हें आपदाएँ नहीं सतातीं, और वे लोकमें सदा ही उन्नत उदार तथा जयशील बने रहते हैं। भावैकान्तकी सदोषता भावैकान्ते पदार्थानामभावानामपह्नवात् । सर्वात्कमनाद्यन्तमस्वरूपमतावकम् ॥६॥ (हे वीर भगवन् ! ) यदि पदार्थोंके भाव ( अस्तित्त्व ) का एकान्त माना जाय-यह कहा जाय कि सब पदार्थ सर्वथा सत् रूप ही हैं, असत् ( नास्तित्व ) रूप कभी कोई पदार्थ नहीं हैतो इससे अभाव पदार्थोका-प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभावरूप वस्तु-धर्मोका-लोप ठहरता है, और इन वस्तु-धर्मोका लोप करनेसे वस्तुतत्त्व ( सर्वथा ) अनादि, अनन्त, सर्वात्मक और अस्वरूप हो जाता है, जो कि आपका इष्ट नहीं है—प्रत्यक्षादिके विरुद्ध होनेसे आपका मत नहीं है।' ( किस अभावका लोप करनेसे क्या हो जाता अथवा क्या दोष आता है, उसका स्पष्टीकरण आगे किया गया है ) प्रागभाव-प्रध्वाभावके विलोपमें दोष कार्य-द्रव्यमनादि स्यात्प्रागभावस्य निह्नवे । प्रध्वंसस्य च धर्मस्य प्रच्यवेऽनन्ततां व्रजेत् ॥१०॥ १. नीति-विरोध-ध्वंसी लोकव्यवहारवर्तकः सम्यक् । परमागमस्य बीजं भुवनैकगुरुर्जयत्यनेकान्तः ॥
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
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