SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 170
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ कारिका ९६-९९] देवागम उभय और अवक्तव्य एकान्तोंकी सदोषता विरोधान्नोभयेकात्म्यं स्याद्वाद-न्याय-विद्विषाम् । अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ॥९७|| ( सर्वात्मरूपसे एक व्यक्तिके एक कालमें ) अल्पज्ञानसे मोक्ष और बहुत अज्ञानसे बन्ध इन दो एकान्तोंमें स्याद्वाद-न्यायके विद्वेषियोंके अविरोध सिद्ध नहीं होता, अतः परस्पर विरोधके कारण उभय एकान्त नहीं बनता। अवाच्यताका एकान्त मानने में भी 'अवाच्य' है यह कहना ही नहीं बनता-इससे पूर्ववत् स्ववचन-विरोध घटित होता है। __अज्ञान-अल्पज्ञानसे बन्ध-मोक्षकी निर्दोष-विधि अज्ञानान्मोहिनो बन्धो नाज्ञानाद्वीत-मोहतः । ज्ञानस्तोकाच मोक्षः स्यादमोहान्मोहिनोऽन्यथा ॥१८॥ _ 'मोह-सहित अज्ञानसे बन्ध होता है-जो अज्ञान मोहनीयकर्मप्रकृति-लक्षणसे युक्त है वह स्थिति-अनुभागरूप स्वफलदानसमर्थ कर्म-बन्धका कर्ता है। जो अज्ञान मोहसे रहित है वह ( उक्त फलदान-समर्थ ) कर्म-बन्धका कर्त्ता नहीं है। और जो अल्पज्ञान मोहसे रहित है उससे मोक्ष होता है; परन्तु मोहसहित अल्पज्ञानसे कर्मबन्धही होता हैं। कर्मबन्धानुसार संसार विविधरूप और बद्धजीव शुद्धि अशुद्धिके भेदसे भेदरूप कामादि-प्रभवश्चित्रः कर्मबन्धाऽनुरूपतः । तच्च कर्म स्वहेतुभ्यो जीवास्ते शुद्धयशुद्धितः ॥९९।। 'कामादिकके उत्पादरूप जो भावसंसार कार्य है वह विचित्र है और कर्मबन्धकी अनुरूपतासे होता है-द्रव्य-कर्मोंका बन्धन
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy