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________________ १९० दशाश्रुतस्कन्धनियुक्ति : एक अध्ययन पाएण एरिसो सिज्झइति कोइ पुणा आगमेस्साए । केण हु दोसेण पुणो पावइ समणो वि आयाई ॥१३४॥ जाणि भणिआणि सुत्ते तहागएसुंतहा निदाणाणि । संदाण निदाणं नियपच्चोति य होंति एगट्ठा ॥१३५॥ दव्वप्पओगवीससप्पओगसमूलउत्तरे चेव । मूलसरीरसरीरी साती अमणादिओ चेव ॥१३६॥ णिगलादि उत्तरो वीससाउ साई अणादिओ चेव । खेत्तम्मि जम्मि खेते काले कालो जहिं जो उ ॥१३७॥ प्रायेण ईदृशः सिध्यति इति कश्चित् पुनरागमिष्यति । केन खलु दोषेण पुनः प्राप्नोति श्रमणोऽपि आयातिम् ॥१३४॥ यानि भणितानि सूत्रे तथागतेषु तथा निदानानि । संदानं निदानं निजप्रत्यय इति च भवन्ति एकार्थाः ॥१३५॥ द्रव्यप्रयोगवित्रसप्रयोगसमूलउत्तराणि चैव । मूलशरीराशरीरी सादिरमनस्कादिश्चैव ॥१३६॥ नूपुरादि उत्तरो विस्त्रसा तु सादिः अनादिकश्चैव । क्षेत्रे यस्मिन् क्षेत्रे काले यस्मिन् कालः यस्तु ॥१३७॥ प्राय: (ऊपर वर्णित) इस प्रकार के साधु सिद्धि पाते हैं कोई पुनः संसार-ग्रहण भी करते हैं। पुन: किस दोष से श्रमण उत्पत्ति पाते हैं?।।१३४।। सूत्र (दशाश्रतस्कन्ध छेदसूत्र) में तथागतों (तीर्थङ्करों) द्वारा कथित निदान हैं (उनको करने वाला पुनः आता है), सन्दान (अवलम्बन लेने वाला) निदान और आत्म-निश्चय ये एकार्थक हैं।।१३५।। द्रव्यबन्ध (दो प्रकार का प्रयोग बन्ध और विस्रसा बन्ध, प्रयोग बन्ध मूल और उत्तर बन्ध (दो प्रकार)। मूल बन्ध भी दो प्रकार का होता है- शारीरिक और अशारीरिक-मनादि से अन्य।।१३६।। ___णिगल-नूपुर या वेणी आदि उत्तर बन्ध हैं, विलसा बन्ध (दो प्रकार का होता है)- सादिक विस्रसाबन्ध और अनादिक विस्रसाबन्ध। क्षेत्र की दृष्टि से बन्ध का अर्थ है जिस क्षेत्र में और काल की दृष्टि से अर्थ है जिस काल में बन्ध हो।।१३७।।
SR No.090127
Book TitleAgam 37 Chhed 04 Dashashrutskandh Sutra Ek Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Philosophy, & agam_related_other_literature
File Size13 MB
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