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________________ अव्यवीर्यशक्ति ] [ ८६ समाधान :- द्रव्यवीर्य का सामान्यदृष्टि से कथन किया जावे, तब अभेद है और जब गुणसमुदाय की विवक्षा से कथन किया जाये, तब भेद है । यहां गुण का भेद अलग है, अतः इस विवक्षा में भेद आया, परन्तु अभेद को सिद्ध करने के लिए यह भेद है, भेद के बिना अभेद नहीं होता; अतः 'भेदाभेद' - ऐसा कहा जाता है । द्रव्यवीर्य अपने चतुष्टय को अपेक्षा अस्ति हैं और परचतुष्टय की अपेक्षा नास्ति है । द्रव्यवीर्य अपनी अपेक्षा नित्य है और पर्यायवीर्य भी इस द्रव्यवीर्य में अन्तभित होता है; अतः उसकी अपेक्षा अनित्य है । द्रव्यवीर्य नित्य है, उसे पर्यायवीर्य भी सिद्ध करता है, अतः नित्य का साधन प्रनित्य है । द्रव्य का स्वभाव नित्यानित्यात्मक है, मनेक धर्मात्मक है। नयचक (पालापपद्धति) में कहा भी है :-- नानास्वमावसंयुक्त ध्यं ज्ञात्वा प्रपाणतः ११ सामान्यार्थ :-प्रमाण की अपेक्षा द्रव्य को नानास्वभाब से युक्त जानना चाहिये। शंका :- यदि पर्याय स्वभाव से अनित्य है तो पर्याय को अनित्य कहो, द्रव्य को अनित्य क्यों कहते हो ? १. यह पंक्ति मालापपद्धति के श्लोक क्रमांक ६ में दी गई है, साथ ही द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचऋ में भी यह श्लोक प्राकृत में दिया गया है। अतः नचक्र के साथ ऊपर कोष्ठक में प्रलापपद्धति भी लिख दिया है।
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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