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________________ प्रभुत्वशक्ति ] [८५ पर्याय को द्रवित करता है, अतः गुण और पर्याय के स्वभाव को धारण करके द्रव्य की अनन्त महिमारूप प्रभुत्व उसमें प्रकट करता है । अतः एक अचल द्रव्य का प्रभुत्व अनेक स्वभाववाले प्रभुत्व का कर्ता बनता है । इसप्रकार सब प्रभुत्वों का पुज द्रव्यप्रभुत्व है। गुरण का प्रभुत्व ___ यहाँ गुण के प्रभुत्व का कथन सत्तागुण के प्रभुत्व द्वारा करते हैं । द्रव्य का लक्षण सत्ता है । यह सत्तारूप लक्षण प्रखण्डित प्रतापवाला है और स्वतंत्रता से शोभित है । वह सामान्य-विशेष प्रभुत्व को धारण करता है। वहां सत्ता का सामान्यप्रभुत्व कहते हैं। सत्ता प्रखण्डित प्रताप को धारण करती है, स्वतंत्र शोभा को धारण करती है, स्वरूपरूप विराजमान रहती है । इसमें द्रव्यसत्त्व, गुणसत्त्व और पर्याय सत्त्व का विशेष कथन नहीं किया जाता । यही सत्ता का सामान्य प्रभुत्व है। द्रव्यसत्त्व का प्रभुत्व :- द्रव्यसत्त्व के प्रभुत्व को ऊपर विशेष प्रभुत्व के अन्तर्गत द्रव्य का प्रभुत्व कहते समय कहा जा चुका है, वहीं से जान लेना चाहिये । सर्व गुणसत्त्व का प्रभुत्व :-- गुण अनन्त हैं, उनमें एक प्रदेश-त्वगुण है, उसका जो सत्त्व है, उसे 'प्रवेशसत्त्व' कहते
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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