SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 75
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ निश्चयनप ] [ ७१ निर्जरा, बंध और मोक्ष की परिणतियों के द्वारा निरूपित करना व्यवहार है। जितने भी वचनपिंड द्वारा कथन हैं, वे सब व्यवहार नाम को प्राप्त होते हैं। ऐसे-ऐसे आत्मा से जो अन्य हैं, वे सर्व व्यवहार नाम को प्राप्त होते हैं । एक सामान्य से - संक्षेप में व्यवहार का इतना अर्थ जानना । ___इतना ही व्यवहार जानना कि जिस भाव का वस्तु से अव्यापकरूप सम्बन्ध है, वस्तु के साथ व्याप्य-व्यापक एकमेक सम्बन्ध नहीं है; वह व्यवहारनाम को प्राप्त होता है - ऐसा व्यवहारभाव का कथन द्वादशांग में प्रचलित है, अतः जानना चाहिये। इसप्रकार व्यवहार का स्वरूप कहा । निश्चयनय "जेसिं गुणाग पचयं रिणयसहायं च प्रमेयभावं च । बच्चपरिणमणाधोरणं, तं पिच्छयं भरिणयं ववहारेण ।। येषां गुणानां प्रचर्म, निजपावं च प्रभेदभावं च । द्रव्यपरिणमनायोनं' तन्निश्चयं भगितं व्यवहारेण ॥ येषां गुणानां प्रचयम् एकसमूहं तं निश्चयम् । पुनः येषां द्रव्य-गण- पर्यायाणां निजस्वभावं निजजातिस्वरूपं तं निश्चयम् । पुनः येषां द्रव्यगुणानां मुरगशक्तिपर्यायाणां यं अभेदभाव एकप्रकाशं तन्निश्चयम् । पुनः येषां द्रव्यारणां,
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy