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________________ सत्-उत्पाद और प्रसत्-उत्पाद ] [ ५७ 'सत्-उत्पाद' और 'असत्-उत्पाद' अब द्रव्य के 'सत्-उत्पाद' और 'असत्-उत्पाद' को :िखाते हैं :-- द्रव्य का यह सत्स्वभाव अनादिनिधन है । द्रब्य और गुण अन्वयशक्ति सहित हैं, अतः वे क्रमवर्ती पर्याय में व्याप्त होकर भी द्रव्याथिकनय से अपने वस्तु के सत्पने से जैसे हैं, वैसे ही उत्पन्न होते हैं । पर्याय की अपेक्षा से नया उत्पन्न होने का विधान है, परन्तु अन्वयशक्ति में (द्रव्य ) जैसा है, वैसे ही रहता है, तो भी दो नयों के द्वारा दो प्रकार के उत्पाद का कथन किया है। पर्यायशक्ति में 'असत्-उत्पाद' बताया है, क्योंकि पर्याय नयी-नयी उत्पन्न होती रहती हैं, इसलिए अन्वय शक्ति से व्याप्त होने पर भी पर्यायाथिकनय से पर्याय में 'असत् उत्पाद' बताया है। शंका :- क्या ज्ञेय का ज्ञान में बिनाश या उत्पाद होता है ? यदि उत्पाद होता है तो वह 'असत्-उत्पाद' है, क्योंकि पहले ज्ञय ज्ञान में नहीं पाया था । अतः ज्ञय के ज्ञान में उत्पन्न होने से उत्पाद कहा गया है या नयी ज्ञानपर्याय की अपेक्षा उत्पाद कहा गया है ? समाधान :- द्रव्य की अपेक्षा से 'सत्-उत्पाद' है और पर्याय की अपेक्षा 'असत्-उत्पाद' है । ज्ञ य-ज्ञायक सम्बन्ध
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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