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________________ कारण-कार्य सम्बन्ध ] [ ५३ पुरुष ऐसे कारण कार्य को परिणाम के द्वारा जानें; क्योंकि कारण-कार्य 'परिणाम' से ही होते हैं । वस्तु के उपादान के दो भेद हैं, अष्टसहस्री में भी कहा है : "त्यतात्यक्तात्मरूपं यत् पूर्वापूर्वेण वर्तते । । कालत्रयेपि तद्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥१॥ यत्स्वरूपं त्यजस्येव यन्न त्यजति सर्दया । तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिक शाश्वतं यथा ॥२॥" अर्थ :- द्रव्य का जो त्यक्तस्वभाव (पर्याय रूप) है, वह परिणामरूप हैं और वह व्यतिरेकस्वभाव है; तथा जो प्रत्यक्तस्वभाव है, वह गुण रूप है और वह अन्वयस्वभाव है। द्रव्य में गुण तो पहले से ही विद्यमान हैं, वे ही कायम रहते हैं और परिणाम अपूर्व-अपूर्व होते रहते हैं। ये गरण और परिणाम द्रव्य के उपादान हैं। द्रव्य परिणाम को त्यागता है, परन्तु गुण को सर्वथा नहीं त्यागता । अतः परिणाम 'क्षणिक-उपादान' है और गुण 'शाश्वत उपादान' है। इसप्रकार वस्तु उपादान से सिद्ध है। शंका :- उत्पाद आदि जीवादि द्रव्यों से भेदस्वरूप सिद्ध होते हैं या अभेदस्वरूप ? यदि अभेदस्वरूप सिद्ध १ अष्टसहस्री श्लोक ५८ की टीका
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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