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________________ गुण की विशेषता ] १०१ ] गरण की विशेषता - एक गुण में सब गुणों का रूप होता है। वस्तु में अनन्त गुण हैं और प्रत्येक गुण में सब गुणों का रूप होता है, क्योंकि सत्तागुण है तो सब गुण हैं । अतः सत्ता के द्वारा सब गुणों की सिद्धि हुई। सूक्ष्मगुण है तो सब गुण सूक्ष्म हैं । वस्तुत्वगुण है तो सब गुण सामान्य-विशेषरूप हैं। द्रव्यत्वगुण है तो वह द्रव्य को द्रवित करता है, व्याप्त करता है । अगुरुलघुत्वगुण है तो सब गुण अगुरुला हैं । अबाधित गुण है तो सब गुण प्रबाधित हैं। अमूर्तिकगुण है तो सब गुण प्रमूर्तिक हैं। इसप्रकार प्रत्येक गुण सब गुणों में है, और सबकी सिद्धि का कारण है । प्रत्येक गुण में द्रव्य-गुण-पर्याय तीनों सिद्ध करना चाहिए । जैसे एक ज्ञानगुण है, उसका ज्ञानरूप 'द्रव्य' है, उसका लक्षण 'गुण' है । उसकी परिणति 'पर्याय' है और प्राकृति 'व्यञ्जनपर्याय' है। शंका :- यदि परिणति पर्याय है और ज्ञान पर्याय के द्वारा ज्ञेय में आया है। फिर भी परिणति तो ज्ञेयों में नहीं आई तो ज्ञान पर्याय के द्वारा ज्ञेयों में कैसे पाया ? ___ समाधान :- ज्ञान की परिणति ज्ञेयों में अभेद को अपेक्षा या तादात्म्य की अपेक्षा नहीं आयी। पर्याय की शक्ति ज्ञेयों में उपचारपरिणति से परिणमी है अर्थात आयी है । उपचार से ही उसे ज्ञेयाकार कहा जाता है । द्रव्य-गुण-पर्याय वस्तु के हैं । जो वस्तु का सत् है, वही
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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