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________________ ६] चिद्विलास - का अधिकरण है तथा देव यादि भी उन नारकियों का दुःख नहीं मिटा सकते - ऐसा उस क्षेत्र का प्रभाव है । तथा स्वर्ग की भूमि में सहज शीत प्रादि की वेदना नहीं है। ऐसा उस क्षेत्र का प्रभाव है । ग्रतः आत्मप्रदेश का जो क्षेत्र है, उसका भी प्रभाव ऐसा है कि वह अनन्त चेतना, द्रव्य, गुरण, पर्याय के विलास को प्रकट करता है | इतनी विशेषता है कि नरक आदि के क्षेत्र तो भिन्न वस्तु हैं, लेकिन आत्मप्रदेश के क्षेत्र गुण पर्याय से भिन्न हैं । - इस प्रदेश या क्षेत्र में उत्पाद व्यय ध्रौव्य भी सिद्ध होते | उपचार से एक प्रदेश को मुख्य मानकर उसका उत्पाद व दूसरे प्रदेश को गौण मानकर उसका व्यय समझना चाहिए तथा जो ध्रुवरूप अनुस्यूत शक्ति है, वह मुख्य-गौण रहित वस्तुरूप शक्ति है ऐसा समझना चाहिए । — इसप्रकार प्रदेश या क्षेत्र की अनन्त महिमा है । यह प्रदेश या क्षेत्र लोकालोक को देखने के लिए दर्पण के समान है । जिस जीव ने इस प्रदेश या प्रदेश क्षेत्र में निवास किया है, वही प्रनन्त सुख को भोक्ता हुआ है । ऐसे प्रदेश क्षेत्र को रखने की धारण करने की सामर्थ्य का नाम 'क्षेत्रवीर्यशक्ति' है । (५) कालवशक्ति - अपने द्रव्य-गुण-पर्याय की मर्यादा या काल को रखने की - धारण करने की सामर्थ्य का नाम 'कालवशक्ति' है ।
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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