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________________ २७६] वरणानुयोग-२ निय प्रतिसंलोनता के मेव सूत्र ५७०-५५२ (३) योग प्रतिसलीनता, (४) विविक्त शयनासन-सेवन प्रतिसंलीनता। ३. जोगपरिसंलोमया, ४. विविस्तसयगासणसेवणया । -वि. स. २५, उ.७, सु. २११ इंदिय पडिसलीणयाए भेया५७१.५०-से कितं दियपदिसंलोणया? इन्द्रिय प्रतिसंलीनता के भेद-- ५७१. १०-इन्द्रिय प्रतिसलीनता क्या है-वह कितने प्रकार उल-बियपडिसलीणया पंचविहा पण्णसर, तं जहा 30-इन्द्रिय प्रतिसलीनता पांच प्रकार की कही गई है, यया१. सोइन्दियविसयप्पयारनिरोहो बा, सोइन्दिमविसय- (१) श्रोत्रंन्द्रिय के विषय में प्रवृत्त रहने का निरोध करना पत्तेसु अत्थेसु रागदोसनिग्गहो वा । अथवा श्रोत्र न्द्रिय के विषय प्राप्त होने पर उनमें राग-द्वेष का निग्रह करना । २. चक्विवियविसयप्पपारनिरोही था, चॉक्वदिय- (२) चक्षुरिन्द्रिय के विषय में प्रवृत्त रहने का निरोध करना विसयपत्तेसु अत्येसु रागदोसनिग्गहो पा । अथवा चक्षुरिन्द्रिय के विषय प्राप्त होने पर उनमें राग-द्वेष का निग्रह करना। ३. पाणिदियविसयम्पयारनिरोहोवा, घाणिदियविसय- (३) घ्राणेन्द्रिय के विषय में प्रवृत्त रहने का निरोध करना पत्तेसु अत्थेसु रागदोसनिग्गहो वा । अथवा घ्राणेन्द्रिय के विषय प्राप्त होने पर उनमें राग-द्वेष का निग्रह करना। ४, जिग्मिवियविसमप्पयारनिरोहो बा, जिग्मिविय- (४) जिव्हेन्द्रिय के विषय में प्रवृत्त रहने का निरोध करना पत्तेसु अस्पेतु रागवोसनिगहो या । अथवा जिन्हेन्द्रिय के विषय प्राप्त होने पर उनमें राग-द्वेष का निग्रह करना। ५. फासिदियविसयप्पयारनिरोहो या, फासिरिय- (५) स्पर्श न्द्रिय के विषय में प्रवृत्त रहने का निरोध करना विसयपत्तेसु अत्येसु रागदोसनिग्गहो वा। अथवा स्पर्श न्द्रिय के विषय प्राप्त होने पर उनमें राग-द्वेष का निग्रह करना । से तं इन्षियपडिसलीणया ।। यह इन्द्रिय प्रतिसलीनता तप है। -वि. स. २५, उ.७, सु. २१२ कसाय पडिसलीणयाए भैया कषाय प्रतिसंलीनता के भेद५७२ १०--से कितं कसायपदिसलीणया ? ५७२. प्र.-कषाय प्रतिसंलीनता क्या है वह कितने प्रकार उ०—कसायपरिसलीगया चाउरिवहा पणत्ता, तं जहा- उ-कवाय प्रतिसंलीनता चार प्रकार की है, यथा १. कोहम्मुश्यनिरोहो वा उदयपसस्स था कोहस्स (१) क्रोध के उदय का निरोध करना अथवा उदय प्राप्त विफलीकरणं। क्रोध को निष्फल करना । २. माणस्सुनिरोहो वा उदयपत्तस्स या माणस्स (२) मान के उदय का निरोध करना अथवा उदय प्राप्त विफलीकरणं। मान को निष्फल करना। ३. मायाउदयणिरोहो या, उदयपत्तस्स वा मायाए (३) माया के उदय का निरोध करना अथवा उदय प्राप्त विफलीकरण । माया को निष्फल करना । १ (क) पंच पडिसलीणा पश्नत्ता, तं जहा - (१) सोतिदयपदिसलीणे, (२) पक्वि दियपरिसलीणे, (३) पाणिदियपरिसलीणे, (४) जिभिदियपहिसलीणे, (५: फासिदियपडिलीणे । --ठाणं. अ. ५, उ. २, सु. ४२७ (ख) उव. सु. ३०
SR No.090120
Book TitleCharananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages571
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size18 MB
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