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________________ अनुशा के प्रकार संध पवस्था [२०१ १. जहा से सस्थ आगमे सिया, आगमेण वबहार (१) जहाँ आगम (केवलज्ञान धारक-यावत्-नपूर्व पटुबेजा। धारक) ज्ञानी हो यहाँ उनके निर्देशानुसार व्यवहार करें। २. णो से तत्य आगमे सिया, जहा से तस्य सुते (२) जहाँ आगम ज्ञानी न हों तो वहां श्रुत (जघन्य आचार सिया, मुएणं ववहार पट्टवेग्मा । प्रकल्प उत्कृष्ट नवपूर्व से कम के माता) ज्ञानी के निर्देशानुसार व्यवहार करें। ३. णो से तत्य सुए सिया, जहा से तस्य बाणा (३) जहाँ श्रुतशानी न हों तो वहां गीतार्थों की आज्ञानुसार सिया, आगाए ववहारं पटुवेना । व्यवहार करें। ४. णो से तत्य आगा सिया, जहा से तत्थ धारणा (४) जहां गीतार्यों की आज्ञा न हो तो वहाँ स्थबिरों की सिया, धारणाए ववहार पट्टवेज्जा। धारणानुसार व्यवहार करें। ५. णो से तत्व धारणा लिया, जहा से तस्थ जीए (५) जहाँ स्थविरों को धारणा ज्ञात न हो तो वहाँ सानु सिया, जीएग वबहारं पटुवेज्जा । मत परम्परानुसार व्यवहार करें। इच्छेहि पंचहि ववहारेहि ववहारं पट्टवेज्जा, तं जहा- इन पांच व्यवहारों के अनुसार व्यवहार करें ! १. आगमेनं, २. सुएणं, ३. आणाए, यथा--(१) आगम. (२) श्रुत, (३) आशा, ४. धारगाए. ५. जीएणं। (४) धारणा, (५) जीत। अहा जहा से आगमै, सुए, आणा, धारणा, जीए, आगमज्ञानी, श्रुतशानी, गीतार्य आशा, स्थविरों की धारणा लहा तहा यवहार पटुवेज्जा।। और परम्परा इन में से जिस समय जो उपलब्ध हो सस समय उसी से क्रमशः व्यवहार करें। प०-से किमाह भते? प्र०-भन्ते ! ऐसा क्यों कहा? उ.-आगमबलिया समणा निमांथा। उ०-धमण निर्गन्ध आममानुसार व्यवहार करने वाले इच्चेयं पंचविहं ववहार जया-जया, जहि-जहि, तपा- इन पांच प्रकार के व्यवहारों में से जब-जब जिस-जिस तया, तहि-तहिं अणिस्सिओवहिसय सम्म वबहरमाणे विषय में जो प्रमुख व्यबहार सपलब्ध हों तब-तब उस-उस विषय समणे निग्गये आगाए आराहए भवइ। में मध्यस्थ भाव से व्यवहार करने वाला श्रमण नियन्य जिनाशा -वि. स.८.२.८, सु. ८-६ का आराधक होता है। अणुण्णापगारा-- अनुशा के प्रकार४१७. तिविधा अण्णा पण्णसा. तं नहा ४१७. अनुज्ञा (आशा) तीन प्रकार की कही गई है, यत्रा१. आयरियताए, २. उवासस्यताए, (१) आचार्य की, (२) उपाध्याय की, ३. गणिसाए। -ठाणं. अ.३, उ. ३, सु.१५० (३) गणी की। समणुण्णा पयारा समनुज्ञा के प्रकार४१८. तिबिधा समषुण्णा पण्णसा, तं गहा-- ४१८. समनुज्ञा (विशेष आज्ञा) तीन प्रकार की कही गई है, यथा१. आयरिबत्तए. २. उवज्ञायत्ताए (१) भाचार्य की, (२) उपाध्याय की, ३. गगिताए। -ठाणं. अ. ३, उ. ३, सु. १५० (३) गणी की। उवसंपया पगारा उपसम्पदा के प्रकार४१६. सिविता उक्संपया पणत्ता, तं महा ४१६. उपसम्पदा (समीप रहना) तीन प्रकार की कही गई है, पथा १ (क) ठाणं. अ. ५. उ. २,सु. ४२१ (ख) वव. उ. १०, सु.५
SR No.090120
Book TitleCharananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages571
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size18 MB
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