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________________ सूत्र ८६.९० श्रमण की उपमाएँ संयमी जीवन [३१ पुब्धि विहरिसा अह पच्छा संबुरे कालं करेति तओ पूर्वावस्था में बहुत मोहवाला होकर विहरण करे और फिर पच्छा सिमसि-गाव-अंत करे? संवरयुक्त होकर मृत्यु प्राप्त करे, तो क्या तत्पश्चात् वह सिद्ध, बुद्ध, मुक्त होता है-यावत-मब दुःखों का अन्त करता है? उ.-हंता, मोयमा । खा-पदोसे खीणे-जान-सब्ब दुक्खाण- उ०- हो गौतम ! कांशाप्रदोष नष्ट हो जाने पर-यावत् म रति -नियास. १, 3... सु. १६-१९ सब दुःखों का अन्त करता है। संयमी की विभिन्न उपमाएं-५ समणोवमाओ-. ८६. एवं से हांजए विमुत्ते निस्सगे-जाब-निरुत्रलेवे. श्रमण को उपमायें६. इस प्रकार वह (अपरिग्रही संयमी) साधु धन आदि के लोभ से मुक्त, आसक्ति रहित-पावत्-कर्म या आमक्ति के लेप से रहित, १. सुविमलवर-कंसमायणं व मुक्कतोए, (१) गिर्मल उत्तम कांस्य भाजन के समान स्नेह बन्धन से रहित । २. सखे विव निरंजणे विगय-राय-दोस-मोहे । (२) शंत्र के समान शुद्ध अति राग-द्वेष और मोह से रहित । ३. कुम्मे इव इंदिए गृत्ते । (२) कछुए के समान गुप्तेन्द्रिय। ४, जच्चकंचणं अजायसवे। (४) उत्तम स्वर्ण के समान शुद्ध अर्थात् दोष रहिल । ५. पोक्खर पत्त व निरूवलेवे । (५) कमल के पत्ते के सदृश निलेप । ६. चन्दे इक सोमभावयाए। (६) चन्द्रमा के समान सौम्य स्वभाव वाला । ७. सूरोग्य विस्ततेए । (७) सूर्य के समान देदीप्यमान तेज वाला ! ८. अचले जह मन्दरे गिरिवरे । (८) परीषह होने पर मन्दर पर्वत के समान अचल । ६. अक्षोमे सागरोख थिमिए । (९) सागर के समान क्षोभरहित एवं स्थिर । १०. पुटवो व सवफास-विसहे । (१०) पृथ्वी के समान समस्त अनुकूल एवं प्रतिकूल स्पर्शी को सहन करने वाला। ११. तबसा वि व भासरासिष्छन्निध्वजाततेए । (११) भस्म राशि से आच्छादित अग्नि के समान तप तेज वाला। १२. जलियट्टयासणे विव सेयसा जलते । (१२) प्रज्वलित अमित के सदृश सेजस्विता से दैदीप्यमान । १३. गोसीसचंदणं पि व सीयले सुगंधे य । (१३) गोशीर्ष वन्दन की तरह शीतल और शील के सौरम से युक्त। १४. हरय इव समियभावे । (१४) सरोवर के समान प्रशान्त स्वभाव वाला। १५. उग्पसियसुनिम्मलं आयंसमंडलतलं व पागञ्जमायेणं सुख- (१५) चित कर चमकाए हुए निर्मल दर्पण तल के समान माये। स्वच्छ एवं प्रकट भाव दाला। १६. फुजरोग्य सोंडोरे। (१६) गजराज की तरह शूरवीर । १७. वसमे ब्व जायभामे। (१७) बुषभ की तरह अंगीकृत व्रत भार का निर्वाह करने वाला। १८. सोहे व जहा मिगाहिवे होति दुप्पधरिसे। (१८) मृगाधिपति सिंह के समान परीषहादि से अजेय । १९. सारपसलिलं व सुबहियए । (१९) शरत्कालीन जल के सहरा स्वच्छ हृदय वाला।
SR No.090120
Book TitleCharananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages571
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size18 MB
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