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________________ १२] वरणानुयोग-२ श्रमण की उपमाएं २०. भारंडे व अप्पमले। २१. खग्गिषिसाणं व एगजाते। २२. खाणु चेष उहकाए। २३. सुन्नागारे व अपडिकम्मे । २४. सुमागाराषणांतो निवाय-सरण - पवीप-उमाणमिव निप्पकंपे। २५. सहा खुरो चेव एगधारे । (२०) भारण्ड पक्षी के समान अप्रमत्त । (२१) ग. के सींग के समान अकेला। (२२) स्थाणु (ठूठ) की भांति कायोत्सर्ग में स्थित । (२३) शून्य गृह के समान शारीरिक साज सज्जा से रहित । (२४) वायुरहित शून्य घर में स्थित प्रदीप की तरह ध्यान में निश्चल । (२५) छुरे की तरह धार वाला, अर्थात् एक उत्सर्गमार्ग में ही प्रवृत्ति करने वाला। (२६) सर्प के समान एकाग्र (मोक्ष) दृष्टि वाला । (२७) आकाश के समान किसी का सहारा न लेने वाला। १२८) पक्षी के सहश पूर्ण निष्परिग्रही। (२१) मार्ग के समान दूसरों के लिए निर्मित स्थान में रहने वाला । (३०) वायु के समान प्रतिबन्ध से मुक्त। (३१) जीव के समान अधतिहत बिरोकटोक) गति वाला। २६. जहा अही चेव एगविट्ठी । २७. आगा चेव निरालम्बे । २८. विहग विश्व सम्वओ बिप्पमुक्के । २६. कपपरनिलए जह चेव उरए। ३०. अपशिबढे अनिलोब्ध । ३१. जीयो सव अप्पडिहयगतो।'--प. म. २, अ५, सु. १० १ (क) से जहानामए अणगारा भगवंतो रियास मिता-जाव-निरुवलेवा, १. कंसपाई व मुक्कतोया, २. संखो इव गिरंगणा ३. जीवो इव अप्पडिहयपती, ४. गगगतलं पि व निरालवणा, ५. दायुरिव अपडिबद्धा, ६. सारदसलिन व सुद्धहियया, ७. पृथ्तरपत्तं व निरुवलेवा, ८. कुम्मो इव गुत्ति दिया, ९. विहम इव विप्पमुक्का, १०. खरगविसाणं व एगजाया, ११, भारंउपक्खी व अप्पमता, १२. कुंजरो इब सोंडोरा, १३. वसभी इव जातत्थामा, १४. सीहो इव दुद्धरिसा, १५. मंदरो इव अपकंपा, १६. सागरो इव गंभीरा, १७. चंदो इव सोमलेसा, १८, सूरो इव दित्ततेया, १६. जच्चकणगं व जातरूवा, २०. बसुन्धरा इब समकासविसहा, २१. सुहृतहुयासगो विश्व तेयसा जलता। -सूय सू०२, अ० २, सु. ७१४ (ख) से जहाणामए अणगारा भवंति इरियासमिया-जाव-दिवलेबा, १. कंसपाईव मुक्कतोया, २. संस्न इव निरंगणा, ३. जीवो इव अप्पडिहयगई. ४. जच्चकणगं पिव जायरूवा, ५. आदरिसफलगा इव पागडभावा, ६. कुम्भो इष] मुत्तिदिया, ७. पुक्खरपत्तं व निरुवलेवा, .. गमणमिव निरालंबणा, १. अणितो इव निरालया, १०. चंदो इव सोमलेसा, ११. सूरो इव दिसतेया, १२. सागरी इव गम्भीरा, १३. विहग इव सवयो दिप्पमुक्का, १४. मन्दरो इव अपकंपो, १५. सारयसलिलं इव सुद्धहियया, १६. खम्गिविसाणं इन एगजाया, १७. भारंडपक्षी व अप्पमत्तो, १८. कुंजरो इत्र सौंडीरा, १६. वराभो इव जायत्थामा, २०. सीहो इन दुरिसा, २१. पसुन्धरा हव मध्वफासविसहा, १२. सुहवहयासणी इव तेयसा जलता। -उब सु. १२६ (ग) उव० सु०२७
SR No.090120
Book TitleCharananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages571
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size18 MB
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