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________________ (६३) ( ज्ञान ) है, उसको भजो ( भावनिक्षेप ) । इस तरह यह छह प्रकारका निक्षेप महामंगलरूप है और इच्छित वर देनेवाला है । यहां ' मंगल ' शब्द के अर्थ करते हैं - एक तो ' मं' अर्थात् दो प्रकारके अन्तरंग और बहिरंग मल वा पाप जिससे 'गल' ( गालयति ) अर्थात् गल जावेंनष्ट हो जावें और दूसरा 'मंग' अर्थात् सुल 'ल' ( लाति ) अर्थात् लाता है - जिससे जीव सुखको प्राप्त करता है । यह मंगल प्रत्येक कार्य आदि मध्य और अन्त तक हृदयमें रखना चाहिये ? चौदह मार्गणामें पांच प्ररूपणा गर्भित हैं । सवैया इकतीसा | जीव समास परजापत मन वच स्वास, इंद्री कायमाहिं आव गतिमैं बखानिए । कायबल जोगमाहिं इंद्री पांच ग्यानमाहिं, आहार परिग्रह ए लोभ में प्रवानिए ॥ क्रोधमाहिं भय अरु वेदमाहिं मैथुन है, ग्यान ग्यानमाहिं दर्शदर्शमाहिं जानिए | पांचौं परूपना ए चौदह मैं गर्भित हैं, गुनथान मारगना दोय भेद मानिए ॥ अर्थ - जीवसमास, पर्याप्ति, मनप्राण, वचनप्राण, और श्वासोच्छासप्राण, ये इन्द्रीमार्गणा में और कायमार्गणा में,
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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