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________________ (५८) योजनकी ऊंचाई तक ज्योतिषचक्र है और आकाशमें उसका विस्तार एकसौ दश योजनका है । अर्थात् पृथ्वीसे ७९० योजनकी ऊंचाई से उसका प्रारंभ होता है और ९०० योजनपर अन्त होता है । बीचमें ११० योजनमें उसका विस्तार है । गुणस्थानोंका गमनागमन । छप्पय । मिथ्या मारग च्यारि, तीनि चउ पांच सात भनि । दुतिय एक मिथ्यात, तृतिय चौथा पहला गनि ॥ अत्रत मारग पांच, तीनि दो एक सात पन । पंचम पंच सुसात, चार तिय दोय एक भन ॥ छट्टे षट इक पंचम अधिक, सात आठ नव दस सुनौ । तिय अध ऊरध चौथे मरन, ग्यार बार विन दो मुनौ ॥ ४४ ॥ अर्थ- पहले मिथ्यात गुणस्थान से ऊपर चढनेके चार मार्ग हैं। कोई जीव मिथ्यात्वसे तीसरे गुणस्थानमें जाता है, कोई चौथेमें, कोई पांचवें में और कोई एकदम सातवेंमें जाता । दूसरे सासादन गुणस्थानसे एक ही मार्ग है अर्थात् वहांसे मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही जाता है । तीसरे गुणस्थानसे यदि ऊपर चढता है, तो चौथे गुणस्थान में जाता है
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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