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________________ (५७) तथा मन अर्थात् छहसे गुणा करनेसे ३७५० होते हैं। इन्हें पांच निद्रासे गुणाकार करनेसे पौने उनईस हजार १८७५० भेद होते हैं । और इन भेदोंको स्नेह और मोहरूप दोकी संख्यासे गुणाकार करनेसे ३७५०० होते हैं । इस तरह प्रमादके साढे सैंतीस हजार भेद होते हैं । ये प्रमाद छठे गुणस्थानतक रहते हैं । इनका त्याग करके अपने आपमें स्थिर होना चाहिये। ज्योतिषमंडलकी ऊंचाई। छप्पय । सात सतक अरु नवै, तासुपर तारे राजै। ता ऊपर दस भान, असीपर चन्द विराजै ॥ च्यारि नखत बुध च्यारि, तीनिपर सुक्र बतायौ। तीनि गुरू कुज तीनि, तीनिपर सनि ठहरायो॥ इमि नवसै जोजन भूमितें, जोतिषचक्र बखानिए। इकसौ दस जोजन गगनमैं, फैलि रह्यौ परमा निए ॥ ४३ ॥. अर्थ-पृथ्वीसे ७९० योजनकी ऊंचाईपर तारोंके विमान हैं । उनसे दश योजनकी ऊंचाईपर सूर्य और उससे ८० योजनकी ऊंचाई पर चन्द्रमा है । चन्द्रमासे ऊपर चार योजनपर नक्षत्र, चार योजनपर बुध, तीन योजनपर शुक्र, तीनपर गुरु, तीनपर मंगल और तीनपर शनि; इस प्रकार क्रमसे एकके ऊपर एक हैं । सब मिलाकर पृथ्वीसे ९००
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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