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________________ (४५) अर्थ - पृथ्वीकायके २२ लाख, जलकायके ७ लाख, तेजकायके ३ लाख, वायुकायके ७ लाख, तरुकाय अर्थात् वनस्पतिकायके ८ लाख, दोइंद्रिय के ७ लाख, तेइंद्रिय के ८ लाख, चौ इंद्रियके ९ लाख, पक्षियोंके १२ लाख, जलचारी जीवोंके १२॥ लाख, चौपायोंके १० लाख, सरीसृप जीवेंकि अर्थात् जमीन पर घिसट कर चलनेवाले सांप आदि जीवोंके ९ लाख, नारकियोंके २५ लाख, मनुष्यों के १४ लाख, और देवोंके २६ लाख कुलकोड़ हैं । सबका: जोड़ दो कोड़ाकोड़ीमेंसे आधा लाख कम अर्थात् १९९ ॥ लाख करोड़ होता है । इन सबको जानकर इनपर दयाभाव: रखना चाहिये | स्पर्श रस गंध वर्णादिके भेदसे जीवों के शरीरके जो भेद होते हैं, उन्हें कुल कहते हैं । सम्पूर्ण जीवोंके १९९ ॥ लाख करोड़ भेद हो सकते हैं । योनिस्थानों की अपेक्षा कुल अधिक होते हैं, इसका कारण यह है कि, एक योनि से उत्पन्न हुए जीवोंके भी वर्णादिके भेदसे अनेक भेद हो सकते हैं । अंकगणना के ग्यारह भेद । छप्पय । ग्यार अंक पद एक, अंक दस सब पद जानी । पूरब चौदे अंक, बीस अच्छर जिनवानी ॥ उनतिस अंक मनुष्य, पल्य पैंतालिस अच्छर ।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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