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________________ (४३) प्रकृतियोंमें तीर्थंकरप्रकृति श्रेष्ठ है-पापोंकी क्षय करनेवाली है, इसलिये मैं उसकी वन्दना करता हूं। जिनमतकी श्रद्धा। छप्पय । तिहूं काल षट दरब, पदारथ नव तुम भाखे । सात तत्त्व पंचास्तिकाय, षटकायिक राखे ॥ आठ कर्म गुन आठ, भेद लेस्या षट जाने । पंच पंच व्रत समिति, चरित गति ग्यान बखाने । सरधै प्रतीत रुचि मन धरै, मुकतिमूल समकित यही। पद नमों जोर कर सीस धर, धन सर्वग इह विध कही ॥३१॥ अर्थ-तीन काल-भूत, वर्तमान, भविष्यत्, छहद्रव्यजीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पंचास्तिकाय-. कालद्रव्यको छोड़कर बाकीके पूर्वोक्त पांचद्रव्य, सप्त तत्त्वजीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निजेरा, मोक्ष, नव पदार्थ-पूर्वोक्त साततत्त्व और पुन्य, पाप, षट्काय-पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, और त्रसकाय ( द्वीन्द्रियादि ), आठकर्म-ज्ञानावरणी, दर्शना-. वरणी, वेदनी, मोहनी, आयु, नाम, गोत्र, अन्तराय, आठ गुण-( सम्यक्त्वके ) निःशंका, निःकांक्षा, निर्विचिकित्सिता, अमूढदृष्टी, उपगृहन, स्थितिकरण, वात्सल्य,
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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