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________________ (४१) पाप प्रकृतियोंके नाम। सवैया इकतीसा । घाति सैंतालीस दुक्ख नीच नरकायु पंच, संस्थान संहनन बर्न रस मानिए । नर पसु गति आनुपूरवी फरस आठ, गंध दोय इंद्री चार बुरीचाल ठानिए ॥ अथिर अपर्यापत सूच्छम औ साधारण, उपघात थावर असुभ परवांनिए । दुर्भग दुस्वर औ अनादेय अजस रूप, पाप प्रकृति सौ भेद त्यागि धर्म जानिए २९ अर्थ-घाति प्रकृति ४७, दुःख अर्थात् असाता वेदनीय १, नीच गोत्र १, नरकायु १, संस्थान ( समचतुरस्रको छोड़कर ) अन्तके ५, संहनन ( वज्रवृषभनाराचको छोड़कर) अंतके ५, वर्ण ५, रस ५, नरकगति १, पशुगति १, नरकगत्यानुपूर्वी १, पशुगत्यानुपूर्वी १, स्पर्श ८, गंध २, इंद्री (पंचेन्द्रीको छोड़कर ) ४, अप्रशस्तविहायोगति.१, अस्थिर १, अपर्याप्त १, सूक्ष्म १, साधारण १, उपघात १, स्थावर १, दुर्भग १, दु:स्वर १, अनादेय १, और अजस १ ये सब मिलाकर १०० पाप प्रकृतियां हैं । इनको त्याग कर धर्मका स्वरूप जानना चाहिये ।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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