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________________ (३४) इनमें कुछ तद्भवमोक्षगामी हैं अर्थात् उसी भवसे मुक्त होनेवाले हैं और कुछ ऐसे हैं, जो थोड़ेसे भव धारण करके मोक्ष जावेंगे । इसलिये इन मुक्तरूप आत्माओंकी वन्दना करता हूं । ( इनमेंसे जिनमाता पिता, कुलकर, बलभद्र, रुद्र, और कामदेव छोड़ देनेसे ६३ शलाका पुरुष कहलाते हैं । १६९ में कुछ तीर्थंकर, चक्रवर्ती और कामदेव पदवीके हैं । १६९ ए हैं।) तालीस कर्मप्रकृतिया नौ विध । _____ एकसौ अड़तालीस कर्मप्रकृतियाँ । ग्यानावरनी पांच, दर्सनावरनी नौ विध । दोय वेदनी जान, मोहिनी आठ वीस निध॥ आव चार परकार, नामकी प्रकृति तिरानौ । तथा एकसौ तीन, गोत दो भेद प्रमानौ ॥ कहि अंतरायकीपांच सब,सौअड़तालिस जानिए। इमि आठकरम अड़तालिसौं, भिन्नरूप निज मानिए ॥ २४ ॥ अर्थ-ज्ञानावरणीकी ५, दर्शनावरणीकी ९, वेदनीयकी २, मोहनीयकी २८, आयुकी ४, नामकी ९३ अथवा १०३, गौत्रकी २ और अन्तरायकी ५ इस प्रकार आठों कर्मकी सब मिलाकर १४८ प्रकृतियां हैं । ये १४८ भेद __ १ नाम कर्मकी ९३ प्रकृतियोंमें शरीरके ५ भेद अभेदविविक्षासे माने हैं । जहाँ १०३ भेद माने हैं, वहां शरीरके संयुक्त भेदोंकी अपेक्षासे १५ भेद् माने हैं।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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