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________________ (३१) समय में ७२ और दूसरे समय में १३ प्रकृतियोंको खिपाता है । इस तरह सब मिलाकर १४८ कर्मोंके जालको तोडकर जीव मुक्त हो जाता है और वहां अनन्त सुखोंको भोगता है । हे प्रभो, मैं आपके पैरोंमें पडता हूं, आप मुझे अपने समीप बुला लेवें अर्थात् अपने समान मुझे भी कर्मोंसे रहित कर देवें । मानुषोत्तर पर्वतका परिमाण । कवित्त ( ३१ मात्रा ) । मनुषोत्तर पर्वत चौराई, भूपर एक सहस बाईस । मध्य सात सौ तेइस जोजन, ऊपर चार सतक चौईस सतरहसौ इकईस उंचाई, जड़ चार सौ पाव अरु तीस | रिजु विमान किहि भाँति मिल्यौ है, जोजन लाख को जगदीस ॥ २१ ॥ अर्थ - मानुषोत्तर पर्वत जो कि अढाई द्वीप अर्थात् मनुष्य क्षेत्र बाहिर है और जिसके पहले पहले मनुष्यों का निवास है, उसका विस्तार इस कवित्त में बतलाया है । इस पर्वतकी चौडाई पृथ्वीपर १०२२ योजन है । ऊपर की चौडाई क्रम कम होती गई है । अर्थात् उसकी चौडाई मध्यमें ७२३ योजन है और ऊपर ४२४ योजन है । ऊंचाई इस पर्वतकी १७२१ योजन है और जड इसकी जो कि चित्रापृथ्वी में हैं ४३० योजनकी है । बहुत से लोग समझते हैं कि इस पर्वतसे स्वर्गौका ऋजुविमान मिला होगा, इसलिये इसके ·
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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