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________________ ( १४८ ) एक परदेस में अनंत कर्मवर्गना हैं, एक वर्गना अनंत परमाणु ठानिए || अनुमैं अनंत गुण एक गुणमैं अनंत, परजाय एककै अनंत भेद जानिए | तिनितें हुए अनंत तातें होंहिंगे अनंत, सब जानै समाहिं देव सो बखानि ॥ १०२ ॥ अर्थ- संसार में अपनी अपनी जुदी सत्ताको लिये हुए अनन्त जीव हैं और प्रत्येक जीवके अनन्त गुण हैं । यद्यपि विके गुणोंकी संख्या जीवराशिसे अनन्त गुणी है, तो भी आपसे वह अनन्त ही कही जाती है । इन गुणोंमेंसे एक एक गुणके असंख्यात असंख्यात प्रदेश हैं । क्योंकि जीव असंख्यात प्रदेशी है और निश्चयनयसे जीव और गुणमें भेद नहीं है - वे अभिन्न हैं । जीवके उक्त एक एक प्रदेशमें अनन्त कर्मवणाएँ हैं- प्रदेशों के साथ एकावगाहरूप हो रही हैं और एक एक कर्मवर्गणा में अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु हैं। क्योंकि अनन्त परमाणु मिले विना कर्मरूप वर्गणाएँ नहीं बन सकती हैं । इन सब परमाणुओं में प्रत्येक प्रत्येक परमाणु के अनन्त अनन्त गुण हैं और एक एक गुण, अनन्त अनन्त पर्यायरूप परिणमन करता है तथा एक एक पर्यायके अनन्त अनन्त भेद हैं । इन सब पर्यायोंके अनन्त अनन्त भेद वर्तमान में हैं इनसे अनन्तगुणे पूर्व के अनन्त कालमें हो गये
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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