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________________ (१३१) अप्रत्याख्यानी मान हड्डीके स्तंभके समान है-नब सकता है। परन्तु मुश्किलसे । अप्रत्याख्यानी माया, जिसतरह मेंढेके सींग साधारण टेढ़े और लड़ने में घिसघिसकर कम होते हैं उसी तरह टेढ़ी और धीरे धीरे कम होती है । अप्रत्याख्यानी लोभ गाड़ीके ओंगनके रंग समान है-कठिनाईसे छूट सकता है । ये चार कषाय सम्यक्त्व घात तो नहीं करते हैं, परन्तु व्रत अणुमात्र भी ग्रहण नहीं करने देते हैं और जीवको तिर्यंच गतिमें ले जाते हैं । प्रत्याख्यानी क्रोध गाड़ीके चकेकी लकीरके समान होता है-अधिक समय तक नहीं ठहरता है । प्रत्याख्यानी मान लकड़ीके स्तंभके समान होता है-प्रयत्न करनेसे नब सकता है । प्रत्याख्यानी माया गोमूत्रके समान कम टिदाई लिये होती है । प्रत्याख्यानी लोभ शरीरके ऊपर जो मैल लग जाता है, उसके समान होता है-शीघ्र छूट जाता है । ये चारों कषाय महाव्रत धारण नहीं करने देते हैं और इन कषायोंसे भरे हुए जीव प्रायः मनुष्य गतिमें जन्म पाते हैं । ये प्रत्याख्यानी कषाय एक बारके उत्पन्न हुए अधिकसे अधिक १५ दिनतक रहते हैं। संज्वलन क्रोध पानीकी लकीरके समान है-तत्काल ही नष्ट हो जाता है । संज्वलन मान बेतकी छड़ीके समान है, जो थोड़ेसे प्रयत्नसे ही लच जाती है । संज्वलन माया खुरपाक समान है-उसमें थोड़ीसी ही टिढ़ाई रहती है और सज्वलन लोभ हलदीके रंग समान है-बहुत सुगमतासे मिट जाता है। ग्रन्थकर्ता द्यानतराय कहते हैं कि ये चार कषायभाव
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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