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________________ (१२०) ४२७२* योजनकी मोटाई रह गई है । अर्थात उतनी ऊंचाईमें ५६८२ योजनसे कुछ अधिक घट गई है । इसके ऊपर ३६ हजार योजनकी ऊंचाईपर पांडकवन हैं । इस ३६ हजारमेंसे ११ हजार योजनकी ऊंचाई तक मेरु पर्वतकी चौड़ाई एकसी है अर्थात् वहांतक ३२७२ योजनकी ही मोटाई चली गई है । आगे वह घटी है और घटते घटते पांडुक वनके पास १ हजार योजनकी रह गई है । जिसके बीचमें चूलिकाकी चौड़ाई १२ योजन है और शेषमें दोनों ओर चारसौ चौरानवे चौरानवे योजनके पांडक वन हैं। (४९४+४९४+१२=१०००) . . सौमनस और नन्दनवन पांच पांच सौ योजनके चौड़े हैं और भद्रशाल वन पूर्व पश्चिम बाईस बाईस हजार योजनके हैं। चौदह गुणस्थानों में मरकर जीव कहां कहां जाता है । छप्पय । मिस्र खीन संजोग, तीनमैं मरन न पावै । सात आठ नव दसम, ग्यार मरि चौथे आवै ॥ प्रथम चहूँगति जाय, दुतिय विन नरक तीन गति। चौथे पूरव आवबंधते चहुँगति प्रापति ॥ * इसमें भी दोनों सौमनसवनोंकी चौड़ाई हजार योजन शामिल है ।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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