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________________ ( ११७ ) अंजनगिरि नामके पर्वत हैं, जो चौरासी चौरासी हजार योजन ऊंचे लम्बे और चौड़े हैं तथा आदि मध्य और अन्त में इकसे हैं । इन अंजनगिरियोंके चारों ओर एक एक लाख योजन लम्बी, चौड़ी, गहरी चार चार बावड़ी हैं और उनके भीतर दश दश हजार लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाईके दधिमुख नामके सोलह सफेद पर्वत हैं । इस तरह चारों अंजनगिरि के १६ दधिमुख हैं । जिन बावड़ियों में दधिमुख पर्वत हैं, उनके बाहरी दो दो कोनोंमें दो दो रतिकर पर्वत हजार हजार योजनके लम्बे, चौड़े, ऊंचे हैं । सारे रतिकर ३२ हैं । इस तरह ४+१६+३२ मिलाकर ५२ पर्वत हुए। ये सब ढोलके समान गोल हैं और इन सबके ऊपर एक एक जिनमंदिर है । ऐसे सब मिलाने से ५२ जिनमंदिर होते हैं । वहां वर्षमें तीन बार कातिक, फागुन और आसाढ़ के अन्तिम आठ दिनोंमें देव आते हैं और पूजा, स्तुति, नृत्य गानादि करके जयजयकार करते हैं । मेरुका वर्णन | मेरु एक लाख जड़ ऊंचा निन्यानू हजार, चूलिका चालीस बाल अंतर विमान हैं । नीचें भद्रसाल वन दिसा चारि जिनभौन, पांचसैपै नंदन चैताले चारि वान हैं ॥ साढ़े बासठ हजार सोमनस वन चारि, चैताले ऊंचे सहस छत्तिस बखान हैं ।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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