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________________ ( ११५ ) अर्थ - अनादि मिथ्यादृष्टी या सादि मिथ्यादृष्टी जीवको बहुत कालसे एकेन्द्री में भ्रमण करते करते समय पाकर स्थावर से निकलकर सैनीपंचेन्द्रियत्वकी प्राप्ति होनेको क्षयोपशम लब्धि कहते हैं । लब्धिशब्दका अर्थ प्राप्ति है । शुभ कर्म के उदयसे दान पूजादि शुभ कार्योंके करनेके लिये उद्यत होने को विसोही या विशुद्धि लब्धि कहते हैं । सद्गुरुके 'उपदेश से तवज्ञानकी प्राप्ति होनेको देशनालब्धि कहते हैं । काल पाकर व्रत धारण करके और उपवासादि तपश्चर्या करके अथवा और भी किसी प्रकार आयुकर्मके सिवा शेष सातों कर्मोकी स्थितिको अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण कर देना सो प्रायोग्य लब्धि है । ये चारों लब्धियां इस जीवको यद्यपि अनन्त बार हुई हों; परन्तु पांचवीं करणलब्धि जबतक नहीं हुई हो, तबतक इस जीवको सम्यक्त्वका लाभ नहीं होता । क्योंकि करणलब्धि के विना सम्यक्त्वकी प्राप्ति नहीं होती है, ऐसा नियम है । - करण नाम परिणामों का है। जब मिध्याती जीव सम्यके सन्मुख होता है, उस समय उसके परिणाम अधःकरण, अपूर्वकरण, और अनिवृत्तिकरणरूप होते हैं । जिस करण में उपरित समयवती तथा अधस्तनसमयवर्ती जीवोंके परिणाम सदृश तथा विसदृश हों, उसे अधःकरण कहते हैं । जिसमें उत्तरोत्तर अपूर्व ही अपूर्व परिणाम होते जावें अर्थात्
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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